मस्त विचार 4162
दिन गुज़र जाता है, तपते सूरज की तरह,
शाम आती है तो, ढ़ल जाने को जी चाहता है.
शाम आती है तो, ढ़ल जाने को जी चाहता है.
हमने बारिश में भी जलते हुए मकान देखे हैं.!!
दर्द लिखता हुँ किसी को देता तो नही..!
दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं होता”
नाकाम देख कर हँसता है और कामयाब देखकर जलता है !
जिसे आदमी अपनी तरह से लिखना चाहता है,
और जिंदगी अपनी तरह से लिखती है “