मस्त विचार 3749
मैं अब सबकी उम्मीदें तोड़ सकता हूँ,
कृपया मुझसे कोई भी कुछ उम्मीद ना रखें..
कृपया मुझसे कोई भी कुछ उम्मीद ना रखें..
_ फिर हुआ सच बोलने का नशा और हम लावारिस हो गए.
जब वो फ़िदा ही हमारी सादगी पर है.!
_ मैं ” मैं ” हूँ किसी शहर का अखबार नहीं..
बहुत हिम्मत चाहिए खुद को खुद से रोकने के लिए..
लेकिन बदलते हुए अपने कभी अच्छे नहीं लगते !!