मस्त विचार 2739
धागा ही समझ, तू अपनी “मन्नत” का मुझे
मेरी दुआओ के मुकम्मल होने का दस्तूर तू है.
मेरी दुआओ के मुकम्मल होने का दस्तूर तू है.
अपनी रजा में अब तू रहना सीखा दे,
शिकायत ना हो कभी भी किसी से,
सुख और दुख के पार जीना सीखा दे..
तेरी संगत में खुद को,,,,,,,झुकाना सीख गए,
पहले मायूस हो जाते थे,,,,,,,कुछ ना मिलने पर,
अब तेरी रज़ा में,,,,,,राज़ी रहना सीख गए,,,,!!
कभी खुदा की रजा समझ कर…
कभी अपने गुनाहों की सजा समझ कर.
कौन छूता है इस जमीन को, आसमान से टूट कर…
वो किसी की परछाई बनने में नहीं !!