मस्त विचार 1144
लेकिन
अपनी सोच को थोड़ा बदल कर, उस दुःख को कम जरुर कर सकता हूँ.
लेकिन
अपनी सोच को थोड़ा बदल कर, उस दुःख को कम जरुर कर सकता हूँ.
जबकि हमें चलना है अपने ही पैरों पर…..
भंवरों की तरह गुनगुनाते रहिए.
चुप रहने से रिश्ते भी उदास हो जाते हैं,
कुछ उनकी सुनिए कुछ अपनी सुनाते रहिए.
भूल जाइए शिकवे शिकायतों के पलों को,
और…छोटी छोटी खुशियों के मोती लुटाते रहिए.
खुद कैसे हो कभी भूल कर भी नहीं सोचा.??
काश कोई मुझे भूलने की भी दवा बता देता.
“जल्दी” और “देर”
हम सपने बहुत जल्दी देखते हैं और कार्य बहुत देरी से करते हैं.
हम भरोसा बहुत जल्दी करते हैं और माफ करने मे बहुत देर करते हैं.
हम गुस्सा बहुत जल्दी करते हैं और माफी बहुत देर से माँगते हैं.
हम हार बहुत जल्दी मानते हैं और शुरआत करने मे बहुत देर करते हैं.
हम रोने मे बहुत जल्दी करते हैं और मुस्कुराने मे बहुत देर करते हैं.
बदलें “जल्दी” वरना बहुत “देर” हो जाएगी …