मस्त विचार 852

रिवाज़ तो यही है दुनिया का मिल जाना बिछड़ जाना…

तुम से ये कैसा रिश्ता है………ना मिलते हो ना बिछड़ते हो…

मस्त विचार 849

अजीब सी बस्ती में ठिकाना है मेरा… जहाँ लोग मिलते कम, झांकते ज़्यादा है.!!

लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में झांकते हैं..

_ शायद इसलिए उनकी खुद की ज़िंदगी उलझी रहती है.!!

मस्त विचार 848

वजह पूछने का तो मौका ही नही मिला, _

_ बस वो लहजे बदलते गये और हम अजनबी होते गये.

“– ज़रा अपने लहजे संभाल, बातें नस्लों का पता देती हैं..–“

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