मस्त विचार 851
अरसों बाद खुल के हंसी आयी _ वो भी खुद पे..
क्यों ठहर जाता है हर आता हुआ, जाता हुआ.
तेरे दीवाने में भी क्या आ गयी तेरी अदा.
अजीब सी बस्ती में ठिकाना है मेरा… जहाँ लोग मिलते कम, झांकते ज़्यादा है.!!
_ शायद इसलिए उनकी खुद की ज़िंदगी उलझी रहती है.!!
_ बस वो लहजे बदलते गये और हम अजनबी होते गये. “– ज़रा अपने लहजे संभाल, बातें नस्लों का पता देती हैं..–“
वजह पूछने का तो मौका ही नही मिला, _
नसीहत से फायदा उठाने के लिए उस से कहीं ज्यादा अक्ल चाहिए.
जो मैं नहीं हूँ वैसा दिखने का, सलीका मुझे नहीं आता.
दिल में कुछ और जुबां पे कुछ
ये बाजीगरी का कमाल मुझे नहीं आता.