मस्त विचार 4268
जिस ख़ुशी की तलाश में ताह उमर भटकते रहे दरबदर,
वो ख़ुशी दफ़न थी कहीं हमारे ही अंदर..
वो ख़ुशी दफ़न थी कहीं हमारे ही अंदर..
क्या हमको भी उन आँखों ने ढूंढा होगा..
एक ऐसी पहेली है, जो ज़िंदगी कहाती है,”
जो बोया है वो निकलना तय है..
मेरे पास तो अब मैं भी नहीं..
जिसे अपनी ऊंचाई पर यकीन नहीं होता है.