मस्त विचार 4278
अब तुझे देखने का भी दिल नहीं करता, ये मत समझना नज़रंदाज किया है;
_ मैंने तो नाराज होना भी छोड़ दिया, देख न कितनी नाराजगी है..
नज़रें भी हम पर और नाराजगी भी हमसे.!!
_ मैंने तो नाराज होना भी छोड़ दिया, देख न कितनी नाराजगी है..
वो ख़िलाफ़ रह कर क्या बिगाड़ लेंगे.
मैं ऐतबार न करता तो और क्या करता ….
ये किस तरह की ख़मोशी हर इक सदा में है..
लेकिन हां, जिसे हम आँख भर के देख लें, उन्हें हम उलझन में डाल देते हैं…
याद तो वो है,जो महफिल में आए और अकेला कर जाए _