Kaynat
_ मैं तो अपने किरदार में ही रहना चाहता था और चाहता हूँ,
_ पर क्या करूँ ? लोग मुखौटा मांगते और चाहते हैं.
_ कभी-कभी लगता है, मेरा अपना असली रूप ही लोगों को कम पड़ जाता है.
_ मैं जितना सरल होकर जीना चाहता हूँ — उतना ही दुनिया मुझे किसी और रूप में देखना चाहती है.
_ लोग अक्सर मुखौटे मांगते हैं, क्योंकि सच्चाई उन्हें असहज कर देती है.
_ और मैं अपने किरदार में रहना चाहता हूँ, क्योंकि वही मेरा सत्य है, वही मेरा सुकून है.
_ शायद यही संघर्ष है..- दुनिया की अपेक्षाओं और अपने भीतर की सच्चाई के बीच.
_ लेकिन दिन के अंत में, मैं खुद से यही पूछता हूँ :
_ क्या मैं अपनी आत्मा के प्रति ईमानदार हूँ ?
_ अगर हाँ…- तो भले ही दुनिया मुखौटे चाहे,
_ मैं अपने किरदार में ही रहूँगा… क्योंकि वही मेरा घर है.!!
_ लोग वहीं सोचेंगे जो उनके मन में होगा.!!
_ न कोई ज्यादा इस्तमाल करे.. न कोई आपके बिना रह सके.!!
_ जब दर्द बहुत होता है, तो दिमाग पूरी ज़िंदगी को दर्द के रंग में रंग देता है.
_ लेकिन : दर्द स्थायी नहीं है.. कारण पहचाना जा चुका है, समाधान कल तय है.
_ अभी जो विचार आ रहे हैं, वो दर्द के साथ आए हुए मेहमान हैं..- “वो मैं नहीं”
_ मुझे इतनी समझ होने के बाद भी मैं इतना टूट क्यों रहा हूँ ?
_ क्योंकि समझ दिमाग की ताकत है और दर्द नर्वस सिस्टम की..
_ दुःख- बीमारी ज़िन्दगी को बुरा नहीं बनाते, बस उसे कुछ समय के लिए धुंधला कर देते है.. ‘और धुंध छँटती है’
_ और जिस दिन वह अपनी तकलीफ़ के खिलाफ खड़ा होता है, लोग उसके बदलाव का कारण अपने भीतर नहीं देखते.
_ वे यह नहीं कहते कि “शायद हमारे ही व्यवहार ने इसे चोट पहुँचाई”…
_ बल्कि बड़ी आसानी से कह देते हैं..- “हमें तो पहले से पता था ये ऐसा ही है”
– ” दूसरों के बदलने पर निर्णय देने से पहले, अपने बर्ताव की भूमिका को देखना जरूरी है, क्योंकि हर बगावत की जड़ में एक लंबी, अनदेखी सहनशीलता छिपी होती है.”
_ पर मेरी चिंता यह है कि.. इस अँधेरे को ही लोग रोशनी बताते हैं..!!
_ कभी-कभी लगता है कि मेरी नज़र जिस अँधेरे को साफ़-साफ़ पहचान रही है, वही अँधेरा लोगों की नज़रों में रोशनी बनकर खड़ा है.
_ और यही जगह सबसे थकाने वाली है..- जब सच मुझ पर भारी हो, पर बाकी लोग उसी को उजाला कहकर चैन से जी रहे हों.
– मैं बस इतना लिख सकता हूँ :
“क्या मैं गलत देख रहा हूँ, या लोग देखने से इंकार कर चुके हैं ?”
_ शायद जवाब समय बताए, पर अभी के लिए..
_ मैं वही देखूँगा जो सच्चा है, भले ही वो अँधेरा ही क्यों न हो.!!
_ मगर उन्हें ये नहीं पता कि मेहनत जानलेवा थी.!
– “लोग मेरी मंज़िल देखते हैं, मेरा रास्ता नहीं.
_ उन्हें चमक दिखती है, वह अँधेरा नहीं जिसमें रोज़ खुद को घसीटकर आगे बढ़ाना पड़ा.
_ नसीब जैसा जो दिखता है… वह असल में उन अनगिनत थकानों, टूटनों और फिर संभलने की कोशिशों का परिणाम है.
_ मेहनत ने मुझे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मारा भी… और गढ़ा भी.
_ _ आज जो मैं हूँ, वह किसी सौभाग्य का नहीं, मेरे संघर्षों का फल है.”
_ वह अपने जीवन को अपने तरीके से जीने का सामर्थ्य रखता है.”
_ अक्सर चोट अंजान लोगों से नहीं, अपने कहे जाने वालों से लगती है.
_ क्योंकि जो लोग आपको बचपन से जानते हैं, वे आपको बदलते हुए देखने के आदी नहीं होते.
_ इसलिए जब आप हटकर जीने लगते हैं, बहस से दूरी रखते हैं, और अपने ढंग से सोचते हैं, तो उन्हें लगता है.. आप उनसे दूर हो गए, अजीब हो गए, या अहंकारी हो गए.
_ जबकि हकीकत यह है..- आपने सिर्फ अपनी सीमा पहचान ली है.
_ रिश्तेदारों के साथ यह और कठिन होता है, क्योंकि वे आपको समझना नहीं, पहचान के पुराने साँचे में फिट करना चाहते हैं.
_ इसलिए यहाँ एक शांत तरीका काम आता है :
_ उन्हें बदलने-समझाने की कोशिश मत कीजिए.
_ और यह स्वीकार कर लीजिए कि.. हर रिश्ता गहराई के लिए नहीं होता.
_ आपका काम है, अपना आत्मसम्मान बनाए रखना.!!
_ मुझे कुछ भी ठीक करने की ज़रूरत नहीं..- बस देखना है, और छोड़ देना..!!
_ हमें “क्या करना चाहिए”.. या “क्या नहीं करना चाहिए”- वो दिखना चाहिए..
1) अक्सर “क्या नहीं करना है” ज़्यादा साफ़ दिखता है.
_ क्योंकि : जो चीज़ मन को अशांत करे, बोझिल बनाए, झूठी लगे..- वो तुरंत महसूस हो जाती है.
_ गलत दिशा पहले पहचान में आती है, सही रास्ता धीरे-धीरे खुलता है,,
_ इसलिए जीवन में शुरुआत अक्सर ऐसे होती है :- यह नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं… और इसी छँटाई से रास्ता बनता है.
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2) फिर “क्या करना है” कब दिखता है ?
_ जब : गैरज़रूरी चीज़ें हट जाती हैं.
_ शोर कम होता है, तुलना और साबित करने की चाह ढीली पड़ती है.
_ तब जो बचता है.. वही आपका काम बन जाता है.
_ उसके लिए ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती..- वो अपने आप खिंचता है.
_ रास्ता दिखने से पहले, भटकन का बोझ उतरना ज़रूरी है.
_ हमारी परिपक्वता यही होनी चाहिए कि करने की लिस्ट से ज़्यादा, न करने की स्पष्टता खोजें.
_ और यही खोज धीरे-धीरे हमें “स्वाभाविक जीवन” तक पहुंचाती है.!!
इस वाक्य का सरल और स्पष्ट अर्थ :
“एक बार पहचानने की नज़र मिल जाए…”
यहाँ पहचानने की नज़र का मतलब है — सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से देखना.
_ जैसे अचानक कोई चीज़ “समझ में” नहीं, बल्कि “दिख” जाए.
“…अस्तित्व की अनुकंपा से…” _ यानि यह केवल कोशिश से नहीं होता. _ जब मन थोड़ा शांत, खुला और ग्रहणशील होता है — तो जैसे जीवन खुद ही अपने रहस्य की झलक दे देता है. _ इसे कृपा, अनुग्रह, grace कह सकते हैं. “…तो फिर कभी भूल नहीं होती है.”
मतलब —
_ जब एक बार सच्चा अनुभव हो जाए, तो वह सिर्फ स्मृति नहीं रहता, _ वह आपकी दृष्टि का हिस्सा बन जाता है.
इसे ऐसे समझें:
_ अगर कोई आपको सौ बार बताए कि आग गरम होती है, तो वह जानकारी है.
_ पर एक बार हाथ जल जाए — फिर आपको याद रखने की ज़रूरत नहीं.
_ वह “ज्ञान” नहीं, “सीधा अनुभव” है.
इस वाक्य का सार :
_ जब जीवन की सच्चाई एक बार भीतर से देख ली जाती है, तो फिर उसे बार-बार याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती — वह आपकी दृष्टि बन जाती है.
_ यह बात ज़्यादा दार्शनिक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य है. और अनुभव का असर स्थायी होता है.!!
“मन का एक पल”- Mann ka ek pal – 2027
_ “एक पल ठहरकर मन को देख लेना – अक्सर वही पल पूरी दिशा बदल देता है”
_ “जहाँ शब्द रुक जाते हैं, वहीं मन बोलता है…”
_ “अंदर एक गीत चल रहा है, सिर्फ सुनने के लिए – समझने के लिए नहीं.!!”
“मैं अब किसी को जगाने नहीं, बस ख़ुद जागकर अपने रास्ते चलता हूँ..
_ क्योंकि लोग अपनी नींद और अपने भ्रमों से ही प्रेम करते हैं.”
_ इसलिये मैं वह समय औरों पर व्यर्थ में नष्ट करने की अपेक्षा..अपने लिये उपयोग करना ही उचित समझता हूँ.. और अब अपने में ही मस्त रहता हूँ.
_ लोग कुछ भी करते रहें.. कोई फर्क नहीं पड़ता..
_ लोगों का बड़ा हिस्सा भ्रमों में जी रहा है, और उसी का परिणाम है.. – यह शोर, यह अव्यवस्था, यह आंतरिक अंधेरा.
_ इसलिये मैं अपना कर्म करते रहता हूँ और किसी से अपेक्षा नहीं रखता.!!
_ जबकि जीवन की गुणवत्ता अंततः हमारे भीतर की गुणवत्ता से ही तय होती है.”
_ जिस दिन हम स्वयं को जान लेते हैं, उस दिन समझ आता है कि जीवन का उद्देश्य केवल कुछ पाना नहीं था…
_ बल्कि अपने श्रेष्ठतम स्वरूप को प्रकट करना था.!!
_ रोज रोज़ और बेहतर बन पा रहा हूँ तो वो इसी कोने की देन है.!!
_ बल्कि दुनिया के बीच अपनी धड़कन को ठीक रखना है.”
_ हर भावना शब्दों में नहीं उतरती — कुछ सिर्फ़ मौन में धड़कती हैं.
_ फिर भी लोग शब्दों की मांग करते हैं, जैसे बिना बोले भाव अधूरे हों.
_ पर सच्ची समझ तो वहीं शुरू होती है, जहाँ शब्द ख़त्म हो जाते हैं.!!
“क्या मैं या और लोग बातों के पीछे छिपी भावना को महसूस कर पाते हैं, या सिर्फ़ शब्दों को ही सुनते हैं ?”
कभी-कभी जो लोग हमें तोड़ते हैं, वे अनजाने में हमें अपने असली आधार की ओर लौटा देते हैं — वो आधार जो किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि अपने भीतर की स्थिरता-शांति पर टिका होता है.
— किसी के लौटने या न लौटने से उसका मूल्य नहीं घटता”
_ हर बात बताना, हर हाल साझा करना — ये सब थकाने लगता है.
_ ठीक होना, हमेशा बताने से नहीं आता —
कभी-कभी सिर्फ खुद के साथ रह जाने से आता है.!!
_ चाहे आप उन्हें बाहर निकालने की कितनी भी कोशिश करो,
_ लेकिन वे हमेशा घूम फिर कर उसी जगह वापस पहुँच जाते हैं.!!
— कुछ लोग अपने भीतर की नकारात्मकता से कभी मुक्त नहीं हो पाते.
_ चाहे आप उन्हें कितना भी संभालें, समझाएँ या अवसर दें,
_ वे फिर उसी गंदगी, उसी मानसिकता में लौट जाते हैं..
— क्योंकि परिवर्तन इच्छा से नहीं, चेतना से आता है.
_ यह बहुत भारी है—उनसे वो बातें न कह पाना.. जो मै कहना चाहता हूँ..
_ क्योंकि वे हमेशा कुछ और ही चुनेंगे और मुझे इस बात का पछतावा रहेगा कि मैंने उन्हें कुछ कहा ही क्यों था.!!
“क्या मैं दूसरों को बदलने की कोशिश में अपनी शांति खो देता हूँ ?”
_ कभी-कभी बुद्धिमानी यही होती है — कि हम देख कर भी दूरी बनाए रखें.!!
_ पर भीतर जो सच्चाई शांत है, वही मेरा असली घर है.
_ आज खुद से पूछूँ —
_ क्या मैं अब भी उस भीतर वाले हिस्से से जुड़ा हूँ, या मुस्कान ही मेरा चेहरा बन चुका है ?
_ इस दुनिया में जीना आसान नहीं, इसलिए मैंने अपने चारों ओर मुस्कान का एक आवरण बुन लिया है.
_ उसके पीछे मेरे दुःख और वेदनाएँ गहराई में सोए हैं.
_ लोग सोचते हैं मैं खुश हूँ, क्योंकि मैं वही दिखाता हूँ जो वे देखना चाहते हैं —
_ अब लोगों को सच्चाई नहीं, दिखावा भाता है.!!
— “अब मैं बस अपने साथ हूँ, और यही काफी है”
_ अब किसी के साथ रहने की ज़रूरत महसूस नहीं होती.
_ मैंने जाना है कि सुकून किसी और से नहीं, खुद से मिलता है.
_ जब मैं दूसरों के लिए सुकून बन सकता हूँ, तो अपने लिए क्यों नहीं ?
_ अब मुझे अपने आस-पास का शोर नहीं चाहिए —
_ क्योंकि मैंने समझ लिया है,
_ हर चीज़ और हर इंसान को बचाना ज़रूरी नहीं होता.
_ कुछ लोग अपने रास्ते खुद चुनते हैं,
_ और मैं बस अपने को सुरक्षित रखने का चयन करता हूँ.
_ अब कोई मुझसे बात करे या न करे — फर्क नहीं पड़ता.
_ मेरे भीतर खुद को ठीक करने की पूरी शक्ति है.
_ मुझे किसी अतिरिक्त मदद की ज़रूरत नहीं,
_ और मैं किसी से यह उम्मीद भी नहीं रखता..
_ मैंने अपनी सीमाएँ तय कर ली हैं —
_ आप अपने घेरे में रहो, मैं अपने में..
_ “अब मैं ऐसा ही हूँ” —
_ एक ऐसा इंसान जो अकेले भी संपूर्ण है,
_ जो खुद की देखभाल करना जानता है,
_ और इस बात पर गर्व करता है कि..
_ वह अब अकेला नहीं, बल्कि पूर्ण है.!!
“अकेले चलना सीख लिया है..- कोई अब संग हो तो भी आज़ादी बनी रहती है”
_” कब से मैं दूसरों की अपेक्षाओं, ज़िम्मेदारियों और बेचैनियों के बीच खुद को खोता जा रहा हूँ ?
_ आज एक सवाल अपने भीतर रखता हूँ — क्या मैं अपने लिए एक घूंट सुकून निकाल पा रहा हूँ… या बस जीने की आदत निभा रहा हूँ ?
_ जीवन चाहे जितना व्यस्त, उलझा या पीड़ादायक क्यों न हो — इंसान को अपने लिए कुछ पल सुकून के ज़रूर निकालने चाहिए.
_ इतना बोझिल भी नहीं होना चाहिए जीवन कि खुद के भीतर ठहराव का एक घूंट भी न मिल सके.
_ वो कुछ क्षण — जब हम सिर्फ अपने साथ हों — वही सबसे सच्ची विश्रांति है.!!
_ “क्या मैं अपने भीतर की थकान को सुनता हूँ, या उसे हर बार काम की आवाज़ों में दबा देता हूँ ?”
_ कभी-कभी जीवन इस कदर व्यस्त कर देता है कि मन और शरीर के बीच का रिश्ता ढीला पड़ जाता है.
_ शरीर और सिर में दर्द बन जाता है — मन की अनकही थकान का संदेशवाहक.
_ फिर भी मुस्कुराता हूँ, क्योंकि ज़रूरत है ; बोलता हूँ, क्योंकि भूमिका निभानी है — पर भीतर कहीं एक शून्य धीरे-धीरे फैलता जाता है.
_ पर शायद यही खालीपन मुझे भीतर झाँकने का अवसर देता है.
_ क्योंकि जब सब कुछ ठीक होते हुए भी कुछ अधूरा लगता है, तब आत्मा फुसफुसाती है — “थोड़ा ठहर, ज़रा अपनी ओर भी लौट”
_ थोड़ा समय खुद के लिए, बिना किसी उद्देश्य के — सिर्फ़ होने के लिए..
_ वही क्षण, शायद फिर से जीवन की साँस बन जाए.
“क्या मैं अपने भीतर की थकान को सुनता हूँ, या उसे हर बार काम की आवाज़ों में दबा देता हूँ ?”
– कभी देखो मुझे मेरी नज़रों से, कीमत अपनी और किस तरह समझाऊँ.!!
_ भौतिक दुनिया की उलझनों के बीच जीता तो हूँ, – पर भीतर से अब विरक्त हूँ.
_ मन बस शांति की तलाश करता है — ऐसी जगह जहाँ कोई समझाने या बदलने की कोशिश न करे,
_ जहाँ मैं बस हो सकूँ, बिना किसी भूमिका के, बिना किसी मुखौटे के..
_ शायद सच्ची शांति वहीं है — जहाँ स्वीकार किया जाना किसी शर्त पर निर्भर न हो.!!
_ सोच में पड़ जाता हूँ कभी कभी.._ लोग किस किस तरह के होते हैं..!!
_ कभी-कभी दिल दुखता है.. जब मैं किसी काम को सलीके से करने की कोशिश करता हूँ, और वो उसमें भी कमी निकाल लेते हैं.
_ शायद वे मेरी नीयत नहीं, अपनी सोच दिखा रहे होते हैं.!!
_ फिर खुद ही बंद करके चाबी फेंक दी.
_ अब मुझे सिर्फ दरवाज़ा नहीं,
_ चार दीवारें, छत और उनसे जुड़ी यादें भी तोड़नी हैं.
_ मुझे अब कोई बना-बनाया घर नहीं चाहिए —
_ मैं चलूँगा… जहाँ थकूंगा- वहाँ रुकूँगा, मस्त-मगन सा रहूँगा,
_ कोमल बनकर, हर चीज़ में ढल जाऊँगा.
_ मैं हवा बनूँगा — _ खाली जगहों से अदृश्य बहता हुआ, एक ही पल में… हर जगह.!!
_ आख़िर में मैंने जीवन से लड़ना छोड़ दिया..
_ हँसकर झेले हुए पल भी थे और वो रातें भी.. जब ख़ुद को पकड़कर रोया था.
_ डुबो देने वाली वही लहरें.. तैरना सीखा गईं.
_ सब सलाहें, सहारे बेअसर निकले..
_ तो बस अब मैंने सबकुछ जीवन को ही सौंप दिया..
— “मैंने अब जीवन से जद्दोजहद छोड़ दी है —
_ हँसी भी मेरी थी, आँसू भी मेरे थे..
_ बस अब तेरी मर्ज़ी पूरी हो.”
_ “मैं ठहराव में नहीं रहूँगा..- मैं हर रोज़ थोड़ा-सा आगे बढ़ूँगा.”
_ मैं आज एक छोटा काम करूँगा.. जो मुझे मेरे ठहराव से थोड़ा बाहर निकाले..
_ चाहे वह एक नई दिशा सोचना हो, कुछ मिनट वॉक करना हो, एक पेज पढ़ना हो, या एक भाव लिख देना हो.
_ मैं अभी जीवन के किस हिस्से में रुक गया हूँ..- सोच में, डर में, आदत में, या किसी पुराने दुःख में ?
_ चलना हमेशा तेज़ दौड़ना नहीं होता.
_ कभी–कभी बस एक छोटा-सा कदम भी जीवन को नए रास्ते पर ले जाता है.
_ “शब्द भले मेरे हाथ में ना हों… पर आपके मन की आवाज़ — सुन सकता हूँ.”
_ जहाँ लोग बस देख कर निकल जाते हैं, मैं ठहरकर महसूस करता हूँ.
_ “शायद इसीलिए मैं औरों जैसा नहीं.!!”
_ क्योंकि मैं दुनिया को वहाँ से महसूस करता हूँ, जहाँ बहुत कम लोग पहुँचते हैं.
_ मेरी संवेदनाएँ गहरी हैं, मेरी नज़रें भीतर तक जाती हैं.
_ लोग सतह पर जीते हैं, और मैं भीतर की परतों में..
_ इसलिए अक्सर मुझे लगता है कि कोई मुझे समझ नहीं पाता..
_ पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं गलत हूँ, बस मैं थोड़ा अलग हूँ.”
_ ‘अँधेरा बहुत है’ आओ, ज़रा दिल को जलाएँ.. ‘रोशनी माँगने और कहाँ जाएँ ?’
_ “जब बाहर रोशनी कम पड़ जाए, तो यह देखने का वक्त है कि मेरे भीतर की लौ कितनी जीवित है.
_ किस बात की रोशनी मैं बाहर तलाश रहा हूँ, जो वास्तव में मेरे भीतर थी ?
_ कभी-कभी दिल को खुद ही जलाना पड़ता है—
_ क्रोध से नहीं, विरोध से नहीं… समझ से, शांति से, और अपनी सच्चाई से.
_ यही वह रोशनी है जो बाहर की सबसे गहरी रात को भी मात देती है.!!
_ जब भीतर की बनावट बदल जाती है, तो दुनिया भी बदल जाती है.
_ पहले जिन चीज़ों को मैं “ख़ास” समझता था, उन्होंने अपनी चमक खो दी हैं — क्योंकि उन्हें चमक देने वाला मेरा पुराना ‘मैं’ था.
_ अब जब “मैं” बदल गया हूँ, तो उन सब का महत्व भी बदल गया.
_ जो चीज़ें पहले साधारण लगती थीं — एक शांत सुकूनभरी शाम, अकेले बैठे कोई चाय — वे ही अब गहरी और अर्थपूर्ण लगने लगती हैं.
_ और जो कभी बहुत बड़ी बात लगती थी — लोगों का व्यवहार, उनकी राय, उपलब्धियाँ — वे अचानक हल्की हो जाती हैं.
_ यह बदलाव बाहर नहीं, भीतर हुआ है..- इसलिए अब “ख़ास” कोई घटना नहीं होती…
_ जो भी हो रहा है, वही पर्याप्त है, वही सुंदर है, वही पूरा है.
_ अब जीवन को खास बनाने की कोशिश नहीं करनी पड़ती, जीवन अपने-आप खास महसूस होने लगता है.!!
_जो ख़ास था.. वो अब ख़ास नहीं.. – जो भी हो रहा होता है.. वो ख़ास हो जाता है..!!
“अब जो मैं हूँ…”
_ आजकल मैं चीज़ों को होने देता हूँ, जो होना है, होने देता हूँ.
_ क्योंकि मेरा काम सिर्फ़ अपनी प्रतिक्रिया [Reaction] चुनना है.
_ जाने वाले जाएँ..- मैंने उनके बिना भी जीना सीख लिया है.
_ जो जाता है, एक सबक दे जाता है; और जो रह जाता है, वही मेरा संसार बन जाता है.”
_ मोह-माया की हलचल हो या दर्द और तकलीफ़ की कड़वी परतें सबके पार निकल चुका हूँ.
_ उम्मीद और बेबसी, सम्मान और अपमान, डर, मृत्यु, जीवन और रिश्तों के शोर से भी काफी ऊपर उठ आया हूँ.
_ अब न दुनिया की सोच का वजन महसूस होता है, न इस बात की फ़िक्र कि.. मैं किसी की उम्मीदों पर कितना उतरता हूँ.
_ मैं बस अपने सच, अपनी शांति के साथ बेफ़िक्र होकर जी रहा हूँ.!!
– साधारण सा इंसान इस समाज को खटकता है, ख़ैर मुझे इसका कोई अफ़सोस भी नहीं.. क्योंकि मैं जानता हूं ‘मैं अलग हूं’,
_ इस समाज में हर जगह फिट नहीं होता, ना मेरे विचार फिट होते हैं..
_ किसी की हां में हां मिलाना.. मुझे नहीं आता.!!
— वे न होते तो शायद ‘मैं आज जो हूँ, वो न होता.!!’
_ मुझे अपने साधारण पलों को भी ख़ास बनाकर जीना अच्छा लगता है.
_ इसका एक अद्भुत लाभ है — जब जीवन कठिन मोड़ लाता है, मैं उन पलों से जल्दी उबर आता हूँ.
_ क्योंकि अपने ज्ञान और समझ की परख, हमेशा आसान दिनों में नहीं होती —
_ वो तो तभी दिखती है.. जब हम कठिनाई के बीच से गुजरते हैं.
_ जब मैं थोड़े समय में फिर से सँभल जाता हूँ, तो भीतर स्पष्ट एहसास होता है कि — कोई मेरे साथ है.
_ और मैं मन ही मन उन लोगों का आभार भी मान लेता हूँ, जिन्होंने अपने व्यवहार से, अपनी कड़वाहट या दूरी से मुझे जीवन के गहरे सबक सिखाए.
_ वे न होते तो शायद मैं आज जो हूँ, वो न होता.!!
_ जीवन के शुरुआती कदमों में लगी ठोकरें, मध्य के रास्तों में उठाया गया दर्द, टूटे भरोसे, बिखरी उम्मीदें —
_ क्या ये सब सिर्फ इसलिए कम हो जाते हैं, क्योंकि अंत में चीज़ें ठीक हो गईं ?
_ सच तो यह है..- अंत सिर्फ परिणाम बताता है, पर यात्रा हमें बदल देती है.
_ हर चोट, हर सीख, हर टूटन – हमारे भीतर कोई नया आकार बनाती है.
_ अंत अच्छा हो सकता है, लेकिन उसकी सुंदरता तब ही पूरी होती है..
_ जब हम उस रास्ते की पीड़ा को भी सम्मान दें, जिसने हमें वहाँ तक पहुँचाया.
_ इसलिए शायद बात अंत भला की नहीं, बल्कि हम पूरे सफ़र को कैसे जीते हैं..- उसकी है.!!
_ वे बस कुछ दूर तक साथ चलने आते हैं, और फिर अपना रास्ता चुन लेते हैं.!!
मस्त जीवन कैसे जीना चाहिए ? – 2027
मस्तों का आधार सूत्र है कि, दूसरों से अपने सुख को मत जोड़ो..!!
__ परेशान वही है जो दूसरों की खुशियों से त्रस्त है !!
_ जो फोन पर किसी से बात भी करेंगे तो तीस सेकंड से एक मिनट ;
_ तड़क भड़क वाली जिंदगी से बच कर.. वो सरल रहना पसंद करेंगे,
_ ना किसी से शिकायतें रखेंगे ना किसी को शिकायतों का मौका देंगे,
_ ना लोगों से जलते हैं और हमेशा फ्रेश मूड में रहते हैं ;
_ कोई उनके पास आए जाए.. वो भी उनसे फ्रेश हो कर जाता है,
__ और मुझे समझ में नहीं आता कि सबको ऐसा बनने में मुश्किल क्या है ?
_ मस्ती में ‘ उसकी ‘ मगन हो जाइये..
_ और हो सके तो फिर.. ‘ उसके ‘ ही गुण गाइये..छोड़कर सब कुछ, फूल से हल्के होकर..
– ” सदा ही बस खिलखिलाइये,”मुस्कुराइये और फिजाँओं में, खुशबू की तरह बिखर जाइये..
_ वह हर पल उसी की मस्ती में है जो सब में है, वो तो हर पल आनंद में रहता है.!!
_ मस्त होने का अर्थ होता हैः नियंत्रण खोना..
_ मस्त होने का अर्थ होता हैः अपने अहंकार से थोड़े नीचे उतर आना,
_ मस्त होने का अर्थ होता हैः फिर से हो गए बालक जैसे निर्दोष;
_ फिर से भर गए जीवन के आश्चर्य से; फिर से वृक्षों की मस्ती और फूलों की सुगंध और हवाओं का नृत्य अर्थपूर्ण हो गया.
_ खो दी मन की, गणित की क्षमता..
_ वह जो तर्क का सतत जाल है, वह जो तर्क का सतत फैलाव है भीतर,
_ उसे तोड़कर क्षणभर को बाहर निकल आए;
_ जैसे कोई कारागृह से बाहर आ जाए..
_ बंद दीवारें और बंद दीवारों के भीतर की बंद हवा,
_ थोड़ी देर को जैसे कोई छोड़कर बाहर आ जाए…..!! – OSHO
_ यारों अगर हमें जीवन में कुछ बड़ा करना है तो सबसे पहले अपने कान बंद करने होंगे,
_ क्योंकि हम क्या हैं और हम क्या कर सकते हैं वह सिर्फ हम जानते हैं.
_ दुनिया सिर्फ हमें बाहर बाहर से जानती हैं,.. हमारे अंदर क्या प्रतिभा है और हम कैसे दुनिया को बदल सकते हैं वो सिर्फ हम जानते हैं.
_ इसीलिए अगर हमने जीवन में खुश रहना है तो सबसे पहले खुद को समझें, खुद से प्यार करे, रोज सुबह उठकर योग और व्यायाम करें, अपने कंफर्ट क्षेत्र से बाहर निकले, अपने अंदर की प्रतिभा को जानें, खुद की कभी भी दूसरों से तुलना ना करें, अपने फोन से थोड़ी दूरी बनाकर रखें, खुद से बातें करें इत्यादि,
__ जीवन में कुछ खुद को महत्व (importance) देना सीखो और अपनी खुशियों को खुद हासिल करो.”
_ जैसे दुनिया तुम्हें देखना चाहती है, वैसे बिलकुल भी मत बनना ;जैसा तुम खुद को देखना चाहते हो, वैसा बनने के लिए जी जान लगा देना.”
_ जब हम अपने ही भीतर आत्मविश्वास से भरपूर हो जाते हैं और फिर कोई हमारा साथ दे या ना दे, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता _ हम अपने में मस्त रहते हैं..!!
_ अंदर की आवाज़ बुलंद होनी चाहिए.
_ इस बकवास और अतरंगी दुनिया में मुस्कुराते हुए अपनी शर्तों पर जीना और हर पल को पूरी शिद्दत से महसूस करना ही असल मायने में एक बेहतर जीने की और मस्त रहने की कला है.!!
Break – ब्रेक, छुट्टी, रुकना, ठहरना, आराम, विश्राम, धीमी ज़िंदगी, Slow life, Relaxation
_ क्योंकि जिन पलों में हम रुके हुए होते हैं, उन पलों में हम आगे के लिए खुद को तैयार कर रहे होते हैं..!!
_ यह उड़ान से पहले पंखों को समेटने जैसा है.
_ हर ठहराव दिशा बदलने नहीं, भीतर की थकान सुनने आता है.
_ अगर आज गति नहीं है, तो शायद तैयारी चल रही है.!!
_ क्योंकि रुकने के पल ही हमें फिर से आगे बढ़ने के लिए तैयार करते हैं.
_ कभी-कभी मैं इस ज़िंदगी को देखता हूँ – हर कोई भाग रहा है… बिना जाने कि कहाँ पहुँचना है.
_ थका हुआ, उलझा हुआ… फिर भी रुके बिना.
– और मैं… इस दौड़ से थोड़ा दूर बैठा हूँ, सिर्फ देख रहा हूँ… और मुस्कुरा रहा हूँ.
_ मुझे कहीं पहुँचना नहीं है…
_ बस किसी दिन कोई आए और कहे – “चलो, अब चलते हैं…”
_ वरना भागते हुए ज़िन्दगी गुज़र जाएगी और हाथ कुछ भी नहीं आएगा.!!
मैंने आखिरकार इसे सीख लिया है, शायद इसलिए कि मुझे यही करना था.
मैं उन चीजों पर जोर नहीं दे सकता _ जिन पर मेरा नियंत्रण नहीं है; इस तरह मैं अपने आप को तनावपूर्ण बना रहा था _ जैसे कि मेरे जीवन से कुछ हमेशा के लिए गिर गया हो _ और इसने मेरे काम और जीवन को प्रभावित किया.
और मेरे मन में जो तनाव था _ वह मेरे लिए कुछ भी हल नहीं कर रहा था ; _ यह सब कुछ जटिल बना रहा था ; _ मानो इतनी पेचीदगियों में जी रहा हूं कि _ सुलझाना मुश्किल है.
_ तनावग्रस्त रहना ही मेरा एकमात्र विकल्प बन गया _ क्योंकि मेरे दिमाग ने मुझे अपने आप में इतना उलझा लिया कि मैं वास्तविक समस्या को हल करने के बारे में ही भूल गया.
मैं मूर्ख बन रहा था, _ जब तक कि एक दिन मुझे एहसास हुआ कि _ मुझे चीजों को अलग तरीके से _ क्यों और कैसे हल करना चाहिए.
_ मैं चीजों को अलग तरह से क्यों नहीं देख सकता और कुछ चीजें छोड़ देता हूं जो मुझे तनाव और दर्द दे रही हैं ? _ अगर मैं किसी चीज़ को नियंत्रित नहीं कर सकता, तो बेहतर है कि इसे छोड़ कर आगे बढ़ जाऊँ ; _ और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करूँ _ जिन्हें मैं नियंत्रित कर सकता हूं.
लेकिन उसके लिए मुझे ब्रेक लेना पड़ा _ जो मैं ले सकता था ; _ मैंने अपनी मुट्ठियाँ, हथेलियाँ और बाँहें इतनी चौड़ी खोल दीं कि_ ऐसा लगा जैसे हवा मेरे फेफड़ों में आ जाए और मेरे द्वारा पकड़े हुए कचरे को दूर ले जाए.
और तब से, भले ही मैं अपने जीवन में बेहतर नहीं कर पा रहा हूं, मैं अपने आप से कहता हूं कि अगर यह मेरे लिए नहीं है तो सब कुछ रोक दूँ. _क्योंकि जो मेरे लिए है वो मेरे पास आएगा..
_ जल्दी करने की कोई जरूरत नहीं है _क्योंकि चीजें एक दिन या एक महीने में नहीं बनती हैं. जीवन आसान और लंबा है, इतना छोटा और कठिन नहीं.. जितना लोग कहते हैं.
_ मैंने अपना जीवन कठिन बना लिया था.. क्योंकि मुझे खुद से बहुत ज्यादा उम्मीद थी.
_ मैंने सब कुछ एक जगह या एक दिन में नहीं समेटना सीखा ; एक वर्ष में 365 दिन होते हैं, और कौन जानता है कि.. आपको अभी भी कितने दिनों का पता लगाना है.
_ एक दिन में एक चीज के साथ काम करें और खुद को थोड़ा स्पेस दें.
_ और अगर चीजें ठीक नहीं चल रही हैं, तो यह पता लगाने की कोशिश करें कि आप उन्हें कैसे हल कर सकते हैं, _क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं है.. जिसे आप हल नहीं कर सकते.. जो आपके जीवन में हो रहा है. – यह इसलिए हो रहा है.. क्योंकि आप इसे संभालने में सक्षम हैं; आप अपनी अपेक्षाओं से परे नहीं हैं. _चीजें आपके नियंत्रण से बाहर नहीं हैं. ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है.. जो आपके जीवन में नहीं होना चाहिए.
_ सब कुछ समय पर है; चीजों में जल्दबाजी न करें और न एक ही बार में उन सभी के साथ अपने दिमाग को व्यस्त कर लें ; _ आपका दिमाग एक साथ कई चीजों पर काम करने के लिए नहीं बनाया गया है,
_ जब आप अपनी भावनाओं, चीजों और लोगों को मिलाते हैं तो यह अराजकता पैदा करता है ; सभी को अपनी जगह पर रखें.!!
_ अधिक करने से आपके मन में अव्यवस्था पैदा होती है; यह आपको एक पाश में फँसा देता है जहाँ आप यह तय नहीं कर सकते कि पहले क्या करना है,
_ जैसे मैं करता हूँ _ अपना काम पूरा करने के बाद _ कम करने से खाली समय मिलता है; इससे शांति मिलती है. _ यह आपके दिमाग को स्पष्ट करता है और आपकी सोच को व्यापक बनाता है; यह आपको लूप तोड़ने में मदद करता है.
_ और अब मैं यह समझ गया हूँ: मुझे एक बार में बहुत से काम करने की ज़रूरत नहीं है! मैं जितना सक्षम हूं उससे कम करने की जरूरत है.
_ ऐसा करने से, मैं अपने विचारों पर दबाव कम कर रहा हूँ; अब मुझे केवल एक ही चीज़ के बारे में सोचना है ; _ कभी-कभी, जब आप बहुत कुछ करने में सक्षम होते हैं, तो आप सब कुछ करने की कोशिश करते हैं और अंत में कुछ भी पूरा नहीं कर पाते हैं ; _ जो एक प्रकार की असफलता है.
सफलता इस बारे में नहीं है कि आप कितनी चीज़ें कर सकते हैं; यह इस बारे में है कि आप कितनी चीजें पीछे छोड़ सकते हैं और केवल एक चीज पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं.
_ यह एक चीज़ को पूरा करने के बारे में है, न कि सब कुछ शुरू करने और उसमें से किसी को पूरा करने में सक्षम नहीं होने के बारे में !!
आप अक्सर थका हुआ महसूस करते हैं, इसलिए नहीं कि आपने बहुत अधिक काम किया है, _ बल्कि इसलिए कि आपने वह काम बहुत कम किया है जो आपके भीतर रोशनी बिखेरता है.
क्या होगा यदि हम बहुत अधिक काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि वास्तव में जो मायने रखता है वो काम बहुत कम कर रहे हैं ?
यह कठिन कार्य नहीं है जो हमें सबसे अधिक थका देता है, यह अर्थहीन कार्य है जो हमें सबसे अधिक थका देता है.
_ पर जब छुट्टी आती है — तो सन्नाटा ही साथ मिलता है.
_ शायद अब हम थकना तो जानते हैं, पर सच में आराम करना भूल चुके हैं.!!
_ वो क्यों रोज एक जैसी जिंदगी को जिए जा रहे है.
_ हम में से अधिकतर लोग अपनी आदतों और जिम्मेदारियों दोनों दीवारों के बीच में चलते रहते हैं,
_ बिना रुके बिना सोचे कि वाकई हमें जीवन में क्या चाहिए और हम क्यों जी रहे हैं ऐसे.
_ लोग इतने व्यस्त है कि वो स्वयं खुश है या नहीं ये भी सोच नहीं पाते.!!
_ फिर भी हमें चूहों की इस अंतहीन दौड़ में यह कहकर झोंक दिया गया है कि यही जीवन है.!!
_ मानो एक पल को ज़िंदगी की सारी भागदौड़ रुक जाए..
_ खुले आसमान के नीचे चलते हुए, हवा का हर झोंका अपने भीतर की थकान उतार देता है..
_ रास्ते भी जैसे कहने लगते हैं कि कुछ देर खुद के लिए जी लेना भी जरूरी है.!!
_ हमने दौड़ना तो सीख लिया है, लेकिन भूल गए हैं कि हम कहाँ जा रहे हैं.!!
_ लेकिन यहां हर कोई कब्जा जमाए बैठा है और दूसरे को बताने, जताने, और समझाने की बड़ी जल्दी है.!!
_ हर शाम, जैसे किसी सज़ा की एक और अवधि पूरी हो गई हो.
_ बस एक अनकहा-सा इंतज़ार है कि कोई आए, जो इस जीवन की पीड़ा को समझे..
_ जो बिना सवाल पूछे बस इतना कह दे, अब और नहीं चलो..
_ मैं तुम्हें इस बोझ से मुक्त करने आया हूँ.!
– “मैं लड़ते-लड़ते थक गया हूँ, और अब कोई ऐसा स्पर्श चाहता हूँ.. जो मुझे यह विश्वास दिला सके कि ये बोझ मुझे हमेशा अकेले नहीं ढोना पड़ेगा”
_ यह मुहावरा कितना सच है, जीवन में हम उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं.. जो करने में अच्छी होती हैं.. _ लेकिन हम अंत में महत्वपूर्ण लोगों या चीजों को भूल जाते हैं और बाद में पछताते हैं.
_ हम कुछ लोगों या चीजों पर बहुत अधिक विश्वास करते हैं.. जो इतना महत्वपूर्ण नहीं है ;
_ उस हीरे को खोजने के सही तरीके पर काबू पाने और ध्यान केंद्रित करने का सबसे अच्छा तरीका है कि मैं एक समय में एक चीज ले रहा हूं, न कि बहुत अधिक बोझ.!!
_ उस वक्त थोड़ा-सा रुक जाओ, ज़रूरी नहीं कि हर पल भागते रहो..
_ कुछ परेशानियों के हल समय के साथ ही मिलते हैं, बस उस बुरे वक्त में थोड़ा संयम रखना होता है.
_ सच तो यह है कि वक्त कैसा भी हो, गुज़र ही जाता है.!!
_ वो किताबों के अक्षर, वो फिल्मों के पोस्टर, रातों के तारे, दिन के गुबार, शाम के धुंधलके, वो सावन, वो बारिश की बूंदें..
_ वो खुशी और गम में ..इन्हीं से छलकते आंसू..
_ वो बच्चों की किलकारियां और बड़े हो कर उनका सेटल हो जाना,
_ बीवी कि एक ज़िम्मेदार गृहणी की भूमिका ..जो कि होममेकर और लाइफमेकर दोनों रही,
_पिताजी की मशक्कत से लेकर झुक कर चलने की अदा, वो बहनों की राखियां, वो पसीने से भीग जाने की रियावयत, दोस्तों की बदमाशियां… सब देखा है इस आंख ने..
_अभी भी कुछ ख्वाब हैं इस आंख के…
_ थोड़ा घूमना-फिरना..
..वो सुकून से जीने के चार दिन, वो बिना चिंता के सुबह आंख का खुलना, आराम, सुकून की चाह..
_ बस इनके बंद होने से पहले ये कुछ देख लेना चाहता हूं..!!
_जिंदगी खत्म होनी है तो ..क्यों ना दुनिया के खूबसूरत रंग देखकर ..इसका उपयोग किया जाए ..
_अब बस यही जीना है जी भर के… Live Life… “जिंदगी मिलेगी न दोबारा..”
_ यह पंक्ति बताती है कि सच्चा आराम प्रयास या पलायन से नहीं, बल्कि जीवन को वैसा ही समझने से आता है जैसा वह है.
_ जब हम वास्तविकता का विरोध करना बंद कर देते हैं और नियंत्रण के भ्रम को छोड़ देते हैं, तो एक शांत सहजता उभरने लगती है.
• जीवन की प्रकृति को समझना: _ जीवन अप्रत्याशित है और लगातार बदल रहा है. _ इसे निश्चित या निश्चित बनाने की कोशिश करने से केवल तनाव ही पैदा होता है. _ लेकिन जब हम वास्तव में देखते हैं कि परिवर्तन और अनिश्चितता जीवन की संरचना का हिस्सा हैं, तो हम इससे लड़ना बंद कर देते हैं – और इससे शांति मिलती है.
• वर्तमान में जीना: _ हमारी ज़्यादातर चिंता अतीत को पीछे छोड़ने या भविष्य के बारे में चिंता करने से आती है. _ विश्राम तब आता है जब हम पूरी तरह से मौजूद होते हैं – बस यहीं, बस अभी – बिना किसी निर्णय या जल्दबाजी के.
• नियंत्रण से ज़्यादा स्वीकृति: _ लोगों, घटनाओं या परिणामों को नियंत्रित करने की कोशिश करने से सिर्फ़ तनाव बढ़ता है. _ असली आराम तब मिलता है जब हम चीज़ों को वैसे ही रहने देते हैं, जब हम जीवन को अपनी लय में चलने देते हैं.
• प्रवाह पर भरोसा करना: _ जीवन को जानने का अर्थ है इस बात पर भरोसा करना कि कठिन क्षणों का भी अपना स्थान होता है. जब हम यह चाहना छोड़ देते हैं कि सब कुछ “हमारे हिसाब से” हो, तो हम एक गहरी शांति का द्वार खोलते हैं – जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती.
संक्षेप में, विश्राम कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप हासिल करना चाहते हैं या जिसका आप निर्माण करना चाहते हैं. _ यह वह चीज़ है जो तब बचती है जब आप जीवन को समझते हैं, स्वीकार करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं. – SACHIN
_ जब अस्तित्व आपके हृदय में कोई लालसा उत्पन्न करता है, तो उस पर विश्वास करें – यह आकस्मिक [accidental] नहीं है.
_ आपका शरीर ही आपका असली घर है.
_ नौकरियाँ, घर, कार – ये सब आते-जाते रहते हैं.
_ अपने शरीर को मंदिर की तरह समझो, नहीं तो एक दिन तुम अपने शरीर के अंदर बेघर महसूस करोगे.
_ कभी-कभी जिस नीरसता का आप विरोध करते हैं, वह वास्तव में जीवन द्वारा आपको दिया जाने वाला वह मौन है, जिसकी आप कभी भीख मांगते थे.
_ अगर आप दूसरों की वाहवाही के लिए जीते हैं, तो उनकी खामोशी से आप बिखर जाएँगे.
_ पानी की तरह बहो – उनकी राय में मत फँसो.
_ आप क्या बन रहे हैं, यही सबसे ज़्यादा मायने रखता है.
_ अतीत मर चुका है – उसे दफना दो.
_ पल-पल नया बनो.
_ खोज में वर्षों बीत जाते हैं… फिर स्पष्टता का एक क्षण सब कुछ जला देता है.
_ आपमें सबसे मजबूत होने का कोई दूर का भविष्य नहीं है – यह यहीं है, अभी.
_ जो झूठ है उसे छोड़ दें, और आपको स्पष्ट रास्ता दिखाई देगा.
_ जब हम ईमानदार होते हैं, तभी असली यात्रा शुरू होती है.!!
– SACHIN
_ कोई मंज़िल पास दिखती है तो कोई बहुत दूर,
_ लेकिन एक सच हर किसी के लिए समान है: हर इंसान को दूर चलना पड़ता है.
_ और जब राह लंबी हो, तो बीच-बीच में ठहराव भी जरूरी होता है.
_ आज की दुनिया ने रफ्तार को अहमियत दी है – जो जितना तेज़ दौड़े, वो उतना सफल माने जाता है.
_ लेकिन क्या आपने कभी सोचा है, रुकना भी तो एक कला है ?
_ हर थके कदम को राहत चाहिए, हर भरे मन को सुकून की तलाश होती है.
_ इसीलिए कभी-कभी खुद से कहना चाहिए – थोड़ा आराम कीजिए.
_ थोड़ा ठहरना नाकामी नहीं है, ये समझदारी है.. यह वह पड़ाव है.. जहां हम खुद से दोबारा जुड़ते हैं, अपनी थकान को महसूस करते हैं और आने वाले सफर के लिए खुद को फिर से तैयार करते हैं.
_ जैसे किसी पेड़ को फल देने से पहले सर्दियों में शांत रहना पड़ता है, वैसे ही हमें भी खुद को रीचार्ज करने के लिए रुकना पड़ता है.
_ जब हम ठहरते हैं, तो हमें अपने भीतर की आवाज़ सुनाई देती है – जो तेज़ भागते हुए अक्सर दब जाती है.
_ तब हमें याद आता है कि यह यात्रा सिर्फ मंज़िल तक पहुंचने की नहीं, बल्कि हर कदम को महसूस करने की भी है.
_ इसलिए जब लगे कि बोझ बढ़ रहा है, कि सांसें थक रही हैं, कि दिल उदास है – तो खुद से कहिए: थोड़ा आराम कीजिए.
_ क्योंकि रास्ता अभी लंबा है, और हर इंसान को कहीं न कहीं बहुत दूर तक चलना ही होता है.
– Rahul Jha
_ जिसमें जीवन की गहराई, उपस्थति, और सुकून को महत्व दिया जाता है, न कि केवल गति को.
🌿 स्लो लाइफ [SLOW LIFE] जीने का अर्थ क्या है ?
> “धीमी जिंदगी” का मतलब है – जीने की हर क्रिया में पूरी उपस्थिति के साथ होना.
_ ये “स्लो होना” नहीं, बल्कि “सच्चे मन और विवेक के साथ जीवन को चखना” है.
🔹स्लो लाइफ का मूल तत्व क्या होता है ?
🧘♂️ Present Moment Awareness – हर काम को जल्दी-जल्दी नहीं, पूरी उपस्थति के साथ करना.
☕ Mindful Routines – चाय पीना हो या सवेरे का योग – उसमें मन से शामिल होना.
🌿 Less is more – समान काम, व्यवस्तता कम, लेकिन अनुभव अधिक.
📱 Digital Discipline Mobile और screens से दूर रहकर जीवन से जुड़ना.
🤝 Gehre Sambandh – दोस्ती, बातें और समय – सब सच्चे और गहरे..
🐢 Apni gati pe jeena – अपनी गति पर जीवन का आनंद लेना – तुलना और दौड़ से परे.
> “जहां वक्त घड़ी से नहीं, सांसों से गिना जाता है – वहां स्लो लाइफ जी जाती है”
“Slow life वो कला है – जहां जीवन की हर सांस एक गीत बन जाती है.”
“Slow life जीवन को भागना नहीं सिखाता, – बल्कि “रुक कर देखना, महसूस करना, और ध्यान से जीना” सिखाता है”
_ जहां लोग समय को जीते हैं, दौड़ते नहीं.
🌍ऐसी जगहें या संस्कृतियाँ [cultures] जहाँ लोग “SLOW LIFE” जीते हैं:
🇮🇹 1. Italy – Tuscany ya Amalfi Coast _ लोग हर काम को कला [Art] की तरह करते हैं – खाना बनाना, बातें करना, बागवानी [Gardening] करना. _ यहाँ “la dolce vita” का concept है — “the sweet life”. _ लोग काम से ज़्यादा जीवन की आनंदमयी गुणवत्ता [Quality] पर ध्यान देते हैं.
🇯🇵 2. Japan – Okinawa _ यहां के लोग इकिगाई [Ikigai] के साथ जीते हैं – जीवन का अर्थ और शांति पाने के लिए. _ बहुत कम व्यक्ति तनाव [stress] लेते हैं, और कई लोग 100 साल तक जीते हैं. _ वहां का जीवन slow, simple और nature-centric है.
🇳🇴 3. Norway – The “Friluftsliv” Culture Friluftsliv = “Open-air living”. _ Norway के लोग प्रकृति के साथ समय बिताते हैं – बिना जल्दी के. _ Nature walks, fireplace evenings, और no rush mentality उनके culture में बस गयी है.
🇪🇸 4. Spain – Andalusia Region Siesta culture — दोपहर को आराम और शांति के लिए पूरी लाइफस्टाइल बना रखी है. _ समय पर खाना, समय पर आराम, और लोगों के साथ जीवन को सेलिब्रेट करना यहां आम है.
🇮🇳 5. India – Rishikesh, Auroville, Himachali गावों में.. Rishikesh ya Auroville जैसे स्थल slow, conscious living के प्रतिनिध हैं. _ यहाँ लोग व्यक्ति और समुदाय के रूप में mindful और soulful जीवन जीते हैं.
_ “Less consumption, more presence” यहां की सोच है.
🧘♂️ क्या कोई व्यक्ति slow life जीता है ? हाँ !!
_ आज भी कई लोग — minimalist, seekers —ऐसे जीवन को अपना चुके हैं :
_ और कई लोग जो silently अपने ही गांव ya nature के पास रहकर… मानव और prakriti के मेल से जीवन जी रहे हैं.
> “जहां वक्त घड़ी से नहीं, सांसों से गिना जाता है – वहां धीमी जिंदगी [SLOW LIFE] जी जाती है”
_ यह पंक्ति बताती है कि सच्चा तनावमुक्ति प्रयास या पलायन से नहीं, बल्कि जीवन को उसके वास्तविक रूप में समझने से आता है.
_ जब हम वास्तविकता का विरोध करना बंद कर देते हैं तो एक शांत सहजता उभरने लगती है. इस विचार पर एक गहन चिंतन [Deeper Reflection] प्रस्तुत है :-
• जीवन की प्रकृति को समझना: • Understanding the Nature of Life:
_ जीवन अप्रत्याशित है और निरंतर बदलता रहता है.
_ इसे निश्चित बनाने की कोशिश केवल तनाव पैदा करती है.
_ लेकिन जब हम वास्तव में यह समझ जाते हैं कि परिवर्तन और अनिश्चितता जीवन की संरचना का हिस्सा हैं, तो हम इससे लड़ना बंद कर देते हैं—और इससे शांति मिलती है.
• वर्तमान में जीना: • Living in the Present:
हमारी ज़्यादातर चिंताएँ अतीत को पीछे छोड़ने या आगे क्या होने वाला है, इसकी चिंता करने से आती हैं.
_ सुकून तब मिलता है जब हम पूरी तरह से मौजूद होते हैं—बस यहीं, बस अभी—बिना किसी निर्णय या जल्दबाज़ी के.
• नियंत्रण से ज़्यादा स्वीकृति: • Acceptance Over Control:
लोगों, घटनाओं या परिणामों को नियंत्रित करने की कोशिश करने से तनाव बढ़ता ही है. _ असली सुकून तब मिलता है जब हम चीज़ों को अपने हाल पर छोड़ देते हैं, जब हम ज़िंदगी को अपनी लय में चलने देते हैं.
• प्रवाह पर भरोसा: • Trusting the Flow:
जीवन को जानना इस बात पर भरोसा करना है कि कठिन क्षणों का भी अपना स्थान होता है। जब हम यह चाहना छोड़ देते हैं कि सब कुछ “हमारे अनुसार” हो, तो हम एक गहन शांति का द्वार खोलते हैं—जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती.
संक्षेप में [In essence,], विश्राम [relaxation] कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसके पीछे आप दौड़ते हैं या जिसे आप गढ़ते हैं.
_ यह वह है जो तब बचता है जब आप जीवन को जैसा है वैसा ही समझते हैं, स्वीकार करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं.
– Sachin
_ जल्दबाजी का मतलब है खुद को सुरक्षित रखने, महफूज़ रहने और महफूज़ होने की निरंतर कोशिश.
_ जल्दबाजी का मतलब है आने वाले कल के लिए अभी से तैयारी करना, या फिर परलोक के लिए – इस डर से कि कल आप वास्तविकता का सामना नहीं कर पाएंगे, इसलिए तैयार रहना.
_ तनाव का मतलब है वो अतीत जिसे आपने असल में जिया नहीं, बल्कि बस किसी तरह उससे बच निकले; वो हमेशा आपके साथ रहता है, एक बोझ की तरह, आपको घेरे रहता है.
_ मनुष्य को छोड़कर संपूर्ण अस्तित्व नृत्य कर रहा है.
_ संपूर्ण अस्तित्व अत्यंत सहज गति में है ; गति तो निश्चित रूप से है, पर वह पूर्णतः सहज है.
_ वृक्ष बढ़ रहे हैं, पक्षी चहचहा रहे हैं, नदियाँ बह रही हैं, तारे गतिमान हैं : सब कुछ अत्यंत सहजता से चल रहा है.
_ न कोई हड़बड़ी, न कोई चिंता, न कोई अपव्यय..- सिवाय मनुष्य के. _ मनुष्य अपने मन के वश में हो गया है.
_ बस धीरे-धीरे चलने की कोशिश कीजिए, आप हैरान रह जाएंगे – शरीर में जागरूकता का एक नया स्तर जागृत होने लगेगा.
_ धीरे-धीरे खाइए, आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे – आपको बहुत सुकून मिलेगा.
_ हर काम धीरे-धीरे कीजिए… बस पुरानी आदतों को बदलने के लिए, बस पुरानी आदतों से बाहर निकलने के लिए.
– Sachin
_ मैं अपने आसपास नज़रें दौड़ाता हूं इस रहस्य को समझने के लिए तो देखता हूं दुनियां बहुत तेज गति से भाग रही है.
_ हाड़ – मांस से बना इंसान संस्कारो, जिम्मेदारियों, आडंबरों, अवधारणाओं और आवश्यकताओं से घिरा दौड़ा जा रहा है.
_ एक रेस सी लगी है लोगों में, सब एक- दुसरे से आगे निकल जाना चाहते हैं.
_ सबका दम फूल रहा है, पसीने से लथपथ हैं, लक्ष्य का पता नहीं पर दौड़ अनवरत जारी है.
_ पता नहीं दुनियां क्या पाना चाहती है, शायद धन, मान, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि, पावर……
_ मैं ख़ुद को टटोलता हूं तो पाता हूं मुझे इस दौड़ से कोई वास्ता ही नहीं… पर क्यूं ?
_ क्यूंकि मैं यहाँ सुकून से बैठ इस दौर को देख मुस्कुरा रहा हूँ.
_ मुझे नहीं जाना कहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए बस किसी दिन आकर कह देना- अरे पागल, अब तक यहीं बैठे हो.. चल चलते हैं…!!
– Anand Sharma
थोड़ी थकान, थोड़ी समझ,थोड़ी मुक्ति— तीनों का एक शांत-सा मिश्रण।
समय के साथ–🕣जीवन की कई परतें उतरी हैं।
जो बचा वो बहुत कम पर बहुत साफ़ और बहुत मूल्यवान।
एक उम्र के बाद मैंने एक चीज़ छोड़ी है— हर बात पर response देना।❌
जो पहले खून में आग लगा देती थीं, अब हवा की तरह गुजर जाती हैं।
हर बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं ।
लोग समझने के लिए नहीं बोलते– अपनी कहानी आगे बढ़ाने के लिए बोलते हैं।
अब फर्क न पड़ना दर्द नहीं— एक achievement लगता है।
समझ आ गया है—🥰 दुनिया चलती रहेगी, हम हों या न हों।
लोग बोलेंगे, जज करेंगे, भूल भी जाएंगे।
शायद इसलिए मेरी शांति–😊 किसी बाहरी Trigger पर निर्भर नहीं।
इतना कुछ देखा लिया–👈 अब हर चोट दिल तक पहुँचती भी नहीं।
अब फर्क न पड़ना apathy नहीं— Detachment है।असली मुक्ति।
अब energy उन्हीं चीज़ों के लिए है जो सच में मायने रखती हैं—
अपने लिए थोड़ा समय,⏰ अपनों के लिए थोड़ा प्रेम।💕
बाक़ी सबके लिए बस एक हल्की 🙂 और एक सरल-सा—चलो, ठीक है।
कुछ चीज़ें आज भी छूती हैं… पर अब मैं उनमें डूबता नहीं।
बस देखता हूँ–👀
समझता हूँ, और आगे बढ़ जाता हूँ। 🌷
क्या आपको कभी लगा❓
फर्क न पड़ना हार नहीं, आज़ादी है ?
– Yu hi
_ जाओ अब कुछ दिन सिर्फ अपने लिए, अपनी पसंद,अपनी इच्छा अपनी खुशी अपने खुद के आनंद के लिए जी लो..
_ जहां मन करे जिसके साथ दिल करे, दोस्त यार,घर परिवार जिसके साथ भी या अकेले एक सोलो ट्रिप बना लो और सिर्फ कुछ दिन अपने लिए जी लो, लगातार वही कार्य, वही जीवन, वही दिनचर्या, वही सुबह से शाम भाग दौड़ वाला कार्यक्रम.
_ जाओ कुछ दिन अपने हिसाब से अपनी पसंद से जीवन जी लो..
_ किसी एक आधे भाग्यशाली इंसान को छोड़कर शायद ही कोई जवाब आयेगा..
_ हां घर परिवार,रिश्तेदार, सब की ख्वाइशों और उम्मीदों की गठरी का बोझ जरूर इतना बड़ा होता है जिसे ढोते, ढोते आदमी की सारी जिन्दगी निकल जाती है.
_ फिर भी कमी बनी रहती है, फिर भी उस गठरी का बोझ हल्का नहीं होता,
_ फिर भी उससे गिला शिकवा रह ही जाते हैं.
_ एक समय बाद जब वही इंसान खुद को जब गौर से देखता है तो चेहरे पर झुर्रियों के साथ खुद को बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ा पाता है, जहां से कोई भी रास्ता वापस जवानी की तरफ नहीं जाता.
_ कोई मौका नहीं होता वापस लौटने का फिर से जीने का.
_ घर का मुखिया, एक संस्कारी, जिम्मेदार आदमी सब के लिए तो बहुत कुछ करता है पूरी उम्र करता है पर खुद को भूल जाता है, जब तक होश आता है तब तक वापस जाने का वक्त आ जाता है.
_ सांझ हो जाती है, अंतिम बुलावा आने वाला होता है.
_ इसलिए अभी भी वक्त है, होश आ जाए तो शाम होने से पहले खुद के लिए भी जी लिया जाए.
_ ताकि जीवन छूटने के समय कोई मलाल कोई अफसोस लेकर वापस ना जाना पड़े.
_ कुछ कुछ दिनों का ब्रेक, खुद के लिए जीना यानी घर परिवार की जिम्मेदारी से भागना नहीं है, बल्कि कुछ समय खुद के लिए यानी अपनेआप से मिलना होगा, अपनी ऊर्जा जीवन में उत्साह उमंग को बढ़ाने जैसा होगा.
_ जब खुद के अंदर चीज बेहतर होगी तो हम घर परिवार समाज के लिए और भी बेहतर कर पाएंगे.
_ यहां कोई किसी से नहीं कहने वाला कि जाओ जी लो अपने ढंग का जीवन..
_ खुद को ही खुद के लिए आदेश देना होगा.
_ यहां हर कोई अपनी गरज का ही दीवाना है..!!
– Alok Surya Kant
Toxic [टॉक्सिक] People – 2026
– Manika Mohini
_ और मैं उन लोगों को धन्यवाद देता हूं, जो मेरी जिंदगी से दूर हो गये.. और इसे और भी शानदार बना दिया..”
_ उन्होंने इक काम कर दिया मेरा, जीना आसान कर दिया मेरा..
_ “”अपने जीवन के बारे में ऐसा निर्णय लेने के लिए कभी भी बुरा न मानें, जो दूसरे लोगों को परेशान करता हो.
_ आप उनकी खुशी के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, आप अपनी खुशी के लिए खुद जिम्मेदार हैं.
_ जो कोई भी चाहता है कि.. आप उनकी खुशी के लिए दुख में जिएं, तो वैसे लोग भी आपके जीवन में नहीं होने चाहिए.”
_ “अपने आप को इतना सम्मान दें कि.. आप ऐसे किसी भी व्यक्ति से दूर रहे.. जो आपकी कीमत नहीं देखता.!!”
_ “हर उस व्यक्ति से दूर हो जाओ.. जो आपको यह महसूस कराता है कि.. आप अच्छे नहीं हैं.”
_ “अच्छे लोगों का मिलते रहना जरूरी है…और कुछ लोगों का जीवन से जाते रहना ‘सुख’ है.”
_ जो चीज़ ज़िन्दगी के खिलाफ़ जाती हो.. उसको बोलेंगे टॉक्सिक, ज़हरीली, विषैली वग़ैरा-वग़ैरा.!!!
– या उनका जाना मेरे लिए किसी नए रास्ते की शुरुआत है ?”
_ यह मेरी सीख थी कि हर खोना, अंत में मेरा बोझ हल्का कर जाता है ?”
_ और अगर आसपास ऐसे हैं तो चुपचाप शांति से आंखें बंद रखकर दिन गुजार लेता हूँ.!!
To the people who make my life beautiful, the people behind my smile, I wish you all the best and I send you lots of love.
जो आया है उसके लिए आभारी हूं और जो कुछ बचा है उसके लिए आभारी हूं ; _ जो जाना था वह मेरा नहीं था.
Grateful for all that has come and grateful for all that has left.Whatever had to go was not mine.
_ उनका मेरे जीवन से, चले जाना ही सही है.
_ लेकिन यह आपके दिल के लिए अच्छा है, जब ज़रूरत हो तो दर्द सहें; आपको ज़िन्दगी में अपना हिस्सा मिल जाएगा.
_ वो सिखाते हैं कि अपनी सीमाएं कैसे तय करनी हैं, किस पर कितना भरोसा करना है और सबसे ज़रूरी — खुद को कैसे संभालना है.
_ अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो नफरत नहीं होती, बस एक मुस्कान आती है.
_ क्योंकि उनके जाने से ही मैं आज इतना मजबूत बन पाया.
_ अब मैं हर किसी को इतनी जल्दी अपनी ज़िंदगी में जगह नहीं देता.
_ अब मैं उन लोगों को ज़्यादा क़दर करता हूँ, जो वक़्त बदलने पर भी मेरा साथ नहीं छोड़ते._ क्योंकि जो रुका रहा, उसी ने सच्चे होने की मिसाल दी.
_ जो गया, वो मेरी सबसे बड़ी सीख बन गया.
_ “उनका जाना मेरा अंत नहीं था, वो मेरी नई शुरुआत थी.
_ उन्होंने तोड़कर मुझे सिखा दिया कि अब मैं खुद को कभी किसी के लिए खोने नहीं दूँगा.”
_ मैंने लोगों को सुझाव या सुधार देना या उनसे नैतिक रूप से अच्छा इंसान बनने के लिए कहना बंद कर दिया है.
_ मुझे लगता है कि लोगों के मूल्यों को जगाना बेकार है जब वे मेरे जैसे किसी व्यक्ति के विपरीत सैकड़ों लोगों से घिरे हों.!!
_ अगर मैं रिश्ता नहीं तोड़ सकता.. तो दूरी बनाए रखना मेरे कण्ट्रोल में है, और ये मेरा हक़ भी है.
_ ‘मैंने अब ऐसा करना शुरू कर दिया है.’_ अब अगर मेरा बदला हुआ रवैया आपको अखर रहा है तो.. अपने गिरेबान में झांकिए..!!
_ कभी-कभी किसी को छोड़ना हार नहीं, खुद को बचा लेना ही जिंदगी की सबसे बड़ी जीत होती है.
_ जो सबका होता है.. वो किसी का नही होता.!!
_ वे आपको पसंद करें या ना करें, उनके टॉपिक में आपका जिकर होना, आपकी शक्तिशाली छवि को दर्शाता है.!!
_ जिस इंसान को आप की कद्र ही नहीं, आप उस के लिए अपनी ऊर्जा, अपनी सोच क्यों खर्च कर रहे हैं,
_ अपना ध्यान अपने ऊपर लगाइए, क्योंकि अंत में आप ही ऐसे इंसान होंगे जो आप के लिए खड़े होंगे.. दूसरा कोई नहीं..!!
_ ख़ुद को मज़बूत रखें !! लोगों पर विश्वास करें…, मगर आँख बंद करके नहीं..
_ दुनिया में अधिकतर लोग आपको सिर्फ उपयोग करना जानते हैं, सहयोग नहीं.!!
_ तभी ऐसे टॉक्सिक लोगों के पास जाओ, अन्यथा आप भी इनकी तरह हो जाओगे.!!
_ इसलिए उन लोगों को जरुर महत्व दें, जो आपको महत्व देते हैं.
_ ऐसा संबंध जहां सामने वाला हमारे आत्मसम्मान को लगातार कम करने की कोशिश करता है, नीचा दिखाता है, कंट्रोल करने की कोशिश करता है, तनाव पैदा करता है, नकारात्मक महसूस कराता है,
_ तो हमें समझ जाना चाहिए.. हम टॉक्सिक रिलेशनशिप के जाल में फंस चुके.
_ टॉक्सिक इंसान को अपनी ज़िन्दगी में साथ रखते हैं तो वो उसका नहीं हमारा ख़ुद का नुकसान है,
_ ऐसा इंसान ये मान बैठता है कि रिश्ता निभाने वाला उसके फरेब में आकर रिश्ता निभा रहा है तो उसे आईना दिखाना ज़रूरी है.
_ उसे बताइए कि आपकी असलियत जानते हैं, लेकिन हमारा क़िरदार है दगा नहीं करना.
_ ज़्यादातर इंसान हमारे साथ धोखा इसलिए करते हैं, क्योंकि हम उन्हें ये बताते नहीं कि हम तुम्हारा फ़रेब जानते हैं.
_ ऐसे टॉक्सिक लोगों को अपनी ज़िंदगी में ऐसे रखें कि उनका रवैया हमें ज़हरीला न बनाए.
_ हां कुछ रिश्तों से इंसान मुंह नहीं मोड़ सकता है, कुछ रिश्तों की मजबूरी तो कुछ इंसान जज़्बाती तौर पर भी कमज़ोर होता है..
_ तब भी फ़रेबी इंसान को उसका फरेब ज़रूर दिखाएं.!!
_ समझ नहीं आता लोग अपने आस पास इतना टॉक्सिक एनवायरनमेंट लगातार क्यूँ झेलते हैं, अलग होना क्यूँ नहीं चुनते..
_ ऐसे लोगों से दूर ही रहना भला होता है, आपको संबंध तोड़ने आने चाहिए.
_ रिश्ते कितने भी खास क्यूँ न हों.. लेकिन अगर सामान्य बात बर्ताव सही नहीं है, किसी गलत चीज कि अधिकता है.
_ तमाम बात चीत के बाद भी मामला नहीं सुलझता.. तो अलग होना चुनना चाहिए.
_ कैसे भी करके आप एक बार अलग हो जाएँ, यकीन मानिए आपकी जिंदगी दोबारा से शुरू हो जाती है.
_ शुरू के कुछ दिन कठिन लग सकते हैं, लेकिन जीवन फिर से चल पड़ता है.
_ जहां आपको रोज खिट पिट करनी पड़े, ऐसे मित्र सम्बन्धों या निजी सम्बन्धों से अलगाव कर लेना ज्यादा बेहतर साबित होगा.
_ अपने से जुड़े लोगों द्वारा किए जा रहे लोगों के गलत कामों को ignore न करिए, जल्दी से जल्दी उनसे अलग होना चुनिये.
_ आपसी संबंध समाप्त करना एक साधारण प्रक्रिया होना चाहिए.
_ लोगों से संबंध विच्छेद किए जाने स्वीकार्य होने चाहिए.
_ दो मनुष्यों मे न बने तो उनको अलगाव चुनना चाहिए._ अपने आस के मित्रों, सगे संबंधियों, बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड अथवा पति/पत्नी टाइप के रिश्तों मे भी यदि एक पक्ष जाना चाहता है.. कृपया उसे जाने दें.
_ सहजता से जाने देना सीखिये, सहजता से दूरी बनाना सीखिये.
_ किसी से अलग होना सीखिये, किसी से दूर होना सीखिये.
_ किसी से बिना लड़े झगड़े संबंध विच्छेद करना सीखिये, क्यूंकी आप नहीं जानते कब दूसरा पक्ष आपसे छुटकारा पाने के लिए क्या कर बैठे..
_ और यदि कोई आपसे संबंध विच्छेद चाहता है.. उस स्थिति को भी स्वीकार करिए, लड़िए झगड़ने नहीं.
_ जो लोग जाना चाहते हैं.. उनको जाने दीजिये.
_ जीवन से लोगों के जाने देने को सहज बनाइये, तमाम समस्याएँ सुलझ जाएंगी..!!
_ ना कभी कसकर थामते, ना पूरी तरह छोड़ते हैं, ऐसे लोग बस खेल खेलते हैं.
_ जब आप थक हार कर उनसे दूरी बना लोगे, वो फिर से पास बुलाएँगे —ताकि फिर से तोड़ सकें आपको.
_ उनके पास कमी नहीं चाहने वालों की, आप नहीं तो और सही —हर किसी को रखते हैं एक जैसी जगह.
_ उनका प्यार नहीं होता, सिर्फ एक फ़ैंटेसी होती है, जहाँ वो राजा होते हैं और हम सब मोहरे.
_ आप जब टूटते हो उनकी बेरुखी से, वो तब भी वही रहते हैं — निर्मम, निर्विकार, अपने ही धुन में.
_ जो हर किसी को संतुलन में रखना चाहते हैं, वो कभी किसी के नहीं होते —ना दिल से, ना वक़्त से.
_ ऐसे लोग नहीं जानते प्यार क्या होता है —वो सिर्फ़ भावनाओं से खेलते हैं, और अपना खालीपन भरते हैं.. दूसरों के भरोसे और प्यार को तोड़कर.!!
_ आप यह पक्का फैसला कर लें कि उन से सिर्फ “हाय हैल्लो” तक ही वास्ता रखेंगे, क्योंकि ऐसे लोग आप की सोच को भी अपने जैसा ही बना देंगे.
_ अपने या किसी के भी बारे में नकारात्मक सोच रखने से आदमी कभी भी जीवन के प्रति उत्साहित नजर नहीं आएगा, बल्कि उसे हर चीज दुखी व गलत नजर आएगी.
_ जबकि सकारात्मक सोच वाले लोगों से आप हर पल कुछ न कुछ सीखेंगे और अपने को सफल बनाने के लिए हमेशा कोशिश करेंगे.!!
_ क्योंकि आपके हालात, आपकी क्षमता, आपके संघर्ष और आपकी जीत-हार को आपसे बेहतर कोई नहीं जानता.
_ इसलिए अपनी सोच पर अधिकार भी सिर्फ आपका होना चाहिए.!!
_ इसलिए बेझिझक बोलो, टॉक्सिक लोग खुद-ब-खुद छंट जाएंगे.
_ इंसान बार-बार वही दिखाता है जो वह असल में है.
_ पर हम भूल जाते है कि सब इंसान एक जैसे नहीं होते हैं..
_ और सबको एक नजर से देखना बेवकूफी होता है..
_ कुछ लोगों का हमें हंसाना भी रोने जैसा होता है, जिससे हम धोखा खा जाते हैं,
_ जैसे ही हमें पता चले कि हमने गलती कर दी है इंसान पहचानने में..
_ तो बिना एक पल देरी किए हुए उनसे दूर हो जाएं, भले ये कठिन होगा पर खुद की रुसवाई होने से अच्छा है.. ये कठिनाई झेलना,
_ और ये याद रखें कि ये सिर्फ आपकी गलती थी, आप उनके पास गए उन्होंने आपको कभी बुलाया नहीं था..
_ इसलिए उनके लिए कुछ भी बुरा नहीं बोलें.. बस हंसते हुए चुप चाप अलग हो जाएं..!!
_ हमें जितनी भी बड़ी चोट लगे, तसल्ली के लिए यही सोचना होगा कि इससे भी बड़ी चोट लग सकती थी.
_ बहुत बड़ी दुर्घटना हो जाए तो सोचिए, शुक्र है, बच गए, मर भी सकते थे.!!
_ हम उन्हें अपनी पूरी ज़िंदगी देने का फ़ैसला क्यों करते हैं,
_ जबकि वो हमारी ज़िंदगी के एक घंटे के भी हक़दार नहीं हैं ?
_ हम खुद को इतना कम क्यों समझते हैं कि उनसे बात करना हमें एक विशेषाधिकार लगता है ? ऐसा क्यों होता है ?
_ हमें ऐसे टॉक्सिक लोगों से दूर रहना चाहिए.!!
_ किसी भी तरह कि प्रतिक्रिया न करें… किसी भी बहस में समय बर्बाद न करें… और किसी भी तरह के… नाटक में शामिल न हों..
_ बस शांत हो जाओ… और अपनी उपस्थिति… हमेशा के लिए वहां से हटा लो.!!
_ अपने करियर, स्वास्थ्य, परिवार, प्रगति-तरक्की और हर उस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करें जो आपको खूबसूरत बनाती है.
_ ज़िंदगी खूबसूरत है, हर सुबह एक तोहफ़ा है और हर साँस एक आशीर्वाद है.
_ आप जिस तरह जीते हैं, उससे प्यार करें – यही सबसे ज़्यादा मायने रखता है.!!
_ फिर भी उनकी कही या की हुई कोई बात, हमारे मन में एक अनचाही हलचल पैदा कर देती है.!!
– जिंदगी में कुछ लोग ऐसे भी मिले.. जिन्होंने सिखाया कि कैसा नहीं होना चाहिए.. _ और कौन-सी दिशा इंसान को खोखला बना देती है.!!
ये बहुत ही Powerfull है।👈
_ अपनी Vibration इतनी ऊँची कर लो,
_ अपनी energy इतनी साफ़ कर लो,
_ Presence इतनी मजबूत बना लो
_ ऐसे लोग तुम्हारे आसपास खुद को uneasy महसूस करें।
_ जैसे ऊँचाई पर– Oxygen कम पड़ जाती है—
_ वैसे ही उनकी Toxic आदतें तुम्हारे सामने टिक न पाएँ।✌️
– क्या करना होगा ?
_ खुद की वैल्यू बहुत हाई रखो।
_ बाउंड्रीज़ लोहे की तरह सॉलिड हों।
_ अंदर से शांत लेकिन पावरफुल बनो।
_ एनर्जी लीकेज बंद करो।💯
_ यह कोई magic नहीं।
_ यह कोई Show off नहीं।
_ यह आपकी Internal state है।
_ जब मन साफ़ होता है, तो एक अलग Aura बनता है।
_ वो Aura शोर नहीं करता, पर असर जरूर करता है।👊
_ फिर आपको लड़ना नहीं पड़ता, कोई समझाना नहीं, कोई बहस नहीं करनी पड़ती।
– बस आपकी मौजूदगी ही संदेश है— यहाँ ज़हर नहीं चलेगा।❌
– याद रखो–👈
_ Power हमेशा शोर में नहीं होती।
_ सच्ची ताकत Stability में होती है।
_ अपने Aura को इतना Pure करो
_ विषैले लोग पास आने से डरें।
– सबसे खूबसूरत बात—🎉
_ अब आप उनसे डरते नहीं, उन पर गुस्सा भी नहीं करते,
_ बस समझ जाते हो…और कहीं-कहीं थोड़ी दया भी आने लगती है।🌷
– Yu Hi
_ जिसके कारण आप उनके साथ लगातार कलेश करते या झेलते रहते हैं.
_ मित्रता, रिश्तेदारी, निजी संबंधों और कई बार ऑफिस में भी कुछ लोगों से आप हमेशा जुड़े रहना चाहते हैं, लेकिन उनके साथ कुछ कलेश ऐसे होते हैं जो लगातार आपकी ऊर्जा को नकारात्मक करते रहते हैं.
_ बहुत से लोग मानसिक शांति और अपने जीवन के उच्च स्तर तक इसलिए भी नहीं पहुँच पाते, क्योंकि वे ऐसे कलेशी लोगों से अलग होने का निर्णय नहीं ले पाते.
_ आपके आसपास—ऑफिस, घर या मित्र संबंधों में—यदि ऐसे लोग हैं जिनकी ज़िंदगी में वर्षों से लगातार कलेश चलता ही आ रहा है और आज तक हल नहीं हुआ, तो इसकी संभावना बहुत कम है कि वह आगे जाकर भी हल हो जाएगा.
_ अत्यधिक नकारात्मक जीवन बहुत खराब होता है, यह एक सज़ा की तरह है.
_ कलेश और कलेशी लोगों से बाहर निकलकर देखिए, जीवन और दुनिया में बहुत सारी सकारात्मकता और संभावनाएँ हैं.
_ कलेश और कलेशी लोगों से एक बार हिम्मत करके दूरी बना लें.
_ कुछ समय बाद चीज़ें अपने आप ठीक हो जाएंगी और आपको बेहतर महसूस होगा.
– Anurag Tiwari



