क्या बेचकर हम खरीदें ” फुर्सत ऐ ” ज़िन्दगी…
_ सब कुछ तो ” गिरवी ” पड़ा है जिम्मेदारी के बाजार में..!!
‘जिम्मेदारी’ वो पिंजरा है, जहाँ इंसान आजाद होकर भी कैद है..!!
तुम्हें कैसा लगेगा गर किसी पिंजरे में रख कर,
_ कोई तुमसे कहे के तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम.!!
_ कोई तुमसे कहे के तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम.!!





