हाँ, यह बात थोड़ी कठोर लेकिन सच्ची है.
_ जैसे-जैसे उम्र और अनुभव बढ़ते हैं, बहुत से लोगों को दुनिया से थोड़ा-सा मोहभंग होने लगता है.
_ इसके कुछ कारण होते हैं :
1. हम लोगों को असल रूप में देखने लगते हैं.
_ युवा उम्र में हम मानते हैं कि लोग वैसे ही होंगे जैसे वे कहते हैं.
_ समय के साथ दिखता है कि कहना और होना अलग-अलग है.
2. अपेक्षाएँ धीरे-धीरे टूटती हैं.
_ हम सोचते हैं कि रिश्ते हमेशा सच्चे होंगे, लोग न्यायप्रिय होंगे.
_ जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर एक थकान पैदा होती है.
3. समझ बढ़ती है, पर मासूमियत कम हो जाती है.
_ यह जीवन का स्वाभाविक चरण है –
_ समझ बढ़ती है, पर सरल विश्वास थोड़ा कम हो जाता है.
_ लेकिन यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ भी होता है.
_ यही समय है जब इंसान दो रास्तों में से एक चुनता है:
_ या तो कड़वाहट में जीना, या शांत समझ के साथ जीना..
_ जो दूसरा रास्ता चुन लेते हैं, वे धीरे-धीरे समझ जाते हैं:
“दुनिया पर भरोसा कम भी हो जाए, तो भी जीवन पर भरोसा रखा जा सकता है”
“समझ बढ़ने का दुख यह है कि भ्रम टूट जाते हैं, पर सौभाग्य यह है कि सच दिखाई देने लगता है”
और एक अंदर देखने वाला प्रश्न:
“क्या मैं दुनिया से निराश हो रहा हूँ,
या मैं दुनिया को पहली बार सही रूप में देख रहा हूँ ?”