सुविचार – जीवन क्या है ? – 217

जीवन क्या है, इसकी सटीक परिभाषा कोई नहीं दे सकता.

_ हर कोई जीवन को अपने-अपने तरीके से समझता और समझाता है.
_ और रही गलतियों पर बददुआ मिलने की तो कभी कभी अच्छे बनने पर भी बददुआ मिल जाती है.!!
व्यक्तिगत सुरक्षा की चिंता और जीवन की तैयारियों में ही ‘जीवन’ बीत जाता है,
_ जिससे हम वास्तव में जीवन को कभी जी ही नहीं पाते है.!!
“जीवन को हल्के में मत लो, पर बोझ भी मत बनाओ.!!”
“जीवन जीते हुए चलो..” किसी एक ख्वाब के लिए रिश्ते, स्वास्थ्य या किसी भी चीज को छोड़ते हुए जाओगे तो कल वो मिल भी गया तो उसकी वेल्यू नहीं बचेगी.!!
परफेक्ट कोई भी नहीं होता और न ही इसकी उम्मीद करें,

_ दूसरे की गलतियों के बावजूद प्यार करना ही सही मायने में प्यार है.!!

जब हालात सबसे कठोर हों, तब जो भीतर टिके रहना सीख लेता है..
– वही सच में जीवन को जन्म देता है.!!
कभी जिन बातों पर गुस्सा आता था, जिन पर रो-रोकर रातें कटती थी

_ आज उन्हीं बातों पर हल्की-सी हँसी आ जाती है शायद यही तो जीवन है,
_ दर्द की गहराई को समय की नरमी में घुल जाना और इस बदलाव के लिए किसी चमत्कार की ज़रूरत नहीं होती
_ कभी-कभी बस किसी अपने के दो प्रेमभरे शब्द ही काफी होते हैं, जो भीतर की पूरी दुनिया बदल देते हैं.!!
जीवन का क्या ? यह तो चलता ही रहता है.

_ घटनाओं का क्या ? वे तो घटित होती ही रहती हैं.
_ घटनाओं के साथ हम कर भी क्या सकते हैं, वे होने के लिए स्वतंत्र हैं !
_ हमारी चिंता बस इतनी है कि जब वे घटित हों तो हम उनसे कैसे निपटेंगे.
_ वैसे भी, ज्यादा चिंता करने से होगा क्या ?
_ ठीक है, जब घटनाएँ घटित होंगी, हम उनसे निपटने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे.!!

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