1. संसार की भागदौड़ अंत में थकान, बीमारी और खालीपन ही देती है –
फिर भी मनुष्य उसी में उलझा रहता है.
2. बाहरी यात्रा का अंत अक्सर निराशा है,
और वही भीतर की यात्रा का द्वार बनती है.
3. लोग दौड़ रहे हैं, पर कहाँ—यह किसी को नहीं पता.
शायद रुककर आँखें बंद करना ही पहली समझ है.
4. दुनिया को समझना है तो आँखें खोलकर नहीं,
कभी-कभी उन्हें बंद करके देखना पड़ता है.
5.भीड़ में रहकर भी जो भीतर की शांति खोज ले,
वही सच में जागने की दिशा में है.






