हम किसी को क्या दोष दें, बेवकूफ बनना हमारी आदत है.
_ बचपन से हमें तरह-तरह से बेवकूफ बनाया जा रहा है.
_ मां-बाप बनाते हैं, भाई बहन बनाते हैं, स्कूल के टीचर बनाते हैं, दुकानदार बनाता है, रिक्शेवाला बनाता है, सभी तो बेवकूफ बनाते हैं.
_ हमसे सब अपना मतलब सिद्ध करते हैं.. – यही human relationship है.
_ हम भी दूसरों को बेवकूफ बनाते हैं, पर हम इसमें उतने माहिर नहीं जितने दूसरे हैं.
_ बेवकूफ बनो और बनाओ यही दुनिया का असली विधान है..- बुद्धि मिली ही इसलिए है.
_ हमारी पीड़ा यही है कि दूसरों ने अपने साम्राज्य खड़े कर लिए हम नहीं कर पाए.
_ हम खड़ा कर लेते तो हम ये शिकायतें नहीं करते.!!
– Shailendra Sudharma
किसी को भी बहोत इज्जत देने की जरूरत ही नहीं है.
_ दूसरों को इज्जत दे दे कर हम अपनी ऐसी-तैसी करवाते आए हैं.
_ ये हरकते वही करता है.. जो खुद को भुला हो.
_ कब तक औरों के आगे घुटने टेकते रहोगे.
_ आदमी अपनी दो वक्त की रोटी और सोने की जगह का प्रबंध कर ले तो किसी के आगे दुम हिलाने की जरूरत नहीं रहती.!!
– Shailendra Sudharma
“दूसरों को सिर पर बैठाते-बैठाते, हम खुद ज़मीन पर बैठ गए”
_ किसी को भी बहोत इज्जत देने की जरूरत ही नहीं है.
_ दूसरों को सिर पर बैठाते-बैठाते.. हम अपनी ही क़ीमत गिराते रहे हैं.
_ यह आदत अक्सर उसी में होती है, जो खुद को भूल चुका हो.
_ कब तक हम दूसरों की स्वीकृति के लिए झुकते रहेंगे ?
_ जो इंसान अपनी दो वक्त की रोटी और सिर पर छत का इंतज़ाम कर ले,
उसे किसी के आगे झुककर जीने की ज़रूरत नहीं होती।
_ किसी को भी सम्मान दो – पर आत्मसम्मान खोकर नहीं.!!
आप अकेले हैं, चिन्ता की कोई बात नहीं.
_ इसका सीधा सा मतलब है कि आप इतने मजबूत हैं कि अपनी जिन्दगी अकेले जी सकते हैं और किसी पर आत्मनिर्भर नहीं हैं.
जो आज को सँभाल लेता है, उसका कल अपने आप सँवर जाता है.!!
जिसने अकेले रह कर अकेलेपन को जीता.. उसने सब कुछ जीता..!!
जीवन में सबसे बड़ी ताकत है ‘ख़ुद पर निर्भर रहना’
_ जब आप दूसरों पर कम और ख़ुद पर ज्यादा भरोसा करने लगते हैं, तब आपकी असली शक्ति सामने आती है ;
_ आत्मनिर्भर व्यक्ति हालात से नहीं डरता, बल्कि उन्हें अपने अनुसार ढाल लेता है ;
_ “ख़ुद पर यकीन रखिए, क्योंकि आपकी सबसे बड़ी ताकत आप ख़ुद हैं.!!
खुद पर भरोसा रखें और अपना बोझ खुद उठाएं..
_ क्योंकि अगर दूसरों के सहारे चलेंगे तो ठोकर लगना तय है.!!
_ क्योंकि अगर दूसरों के सहारे चलेंगे तो ठोकर लगना तय है.!!
जीवन में किसी और की छाया में खड़े रहना, खुद के अस्तित्व को कमजोर कर देता है..
_ इसलिए खुद की नींव मजबूत करो.!!
_ इसलिए खुद की नींव मजबूत करो.!!
दूसरों के भरोसे रहने का शौक मत पालो..
_ कहीं वो खुद ही गिर पड़े, तो आपको कौन उठाएगा ?
“जीवन के सहारों को हटाओ..
_ अपनी ज़िन्दगी ख़ुद के दम पर ठीक कर के ख़ुद को दिखाओ.!!
_ “कुछ लोग दुख को ही सुख समझकर उसी में डूबे रहते हैं — ऐसे लोगों पर समय बर्बाद मत करो.
_ सहायता सिर्फ उनकी करो.. जो सच-मुच बदलना चाहते हैं,
_ वरना दूसरों के मानसिक नर्क में उतरते-उतरते, ‘खुद भी डूब जाओगे’.!!
“खुद के दम पर ज़िन्दगी खूबसूरत बनाओ”
_ “जब मैं अपने कदमों पर भरोसा करता हूँ, तभी जीवन अपनी असली चमक दिखाता है”
_ “मैं अपने जीवन की बागडोर खुद संभालता हूँ — धीरे, सहज, अपने ही तरीके से”
स्वयं से प्रश्न:
_ आज मैंने कौन-सा छोटा काम अपने दम पर किया ?
_ मैं कहाँ-कहाँ दूसरों की स्वीकृति [Acceptance] या सहारे की प्रतीक्षा करता हूँ ?
_ क्या आज मैं एक ऐसा छोटा कदम उठा सकता हूँ, जो मुझे थोड़ा और स्वतंत्र बनाए ?
_ क्या मैं अपनी खूबसूरती बाहर ढूँढने के बजाय भीतर बना सकता हूँ ?
_ क्या मैं अपनी मेहनत, अपने निर्णय और अपने शांत मन से अपना रास्ता स्वयं रच सकता हूँ ?
किसी के लिए खुद को मिटा भी दोगे तो क्या..
_ ये दुनिया सहमत होकर मुस्करा देगी ? बिलकुल भी नहीं, बस अपने मतलब की परछाइयाँ टटोलते है लोग..
_ अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर किसी के लिए पूरी कायनात उतार लाओगे तो भी वो तब भी वही सवाल करेगा कि.. हमारे लिए तुम क्या हो ?
_ इसीलिए खुद को संभालो पहले.!!!
जो लोग हर वक़्त दूसरों की ज़िंदगी टटोलते हैं और ताकझांक करते हैं, अक्सर वे अपनी ज़िंदगी से भाग रहे होते हैं.
_ जो लोग दूसरों की ज़िंदगी में इतना इंटरेस्ट ले रहे हैं, उनकी अपनी ज़िंदगी में शायद कुछ बहुत कमी है.
_ और जो अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं.. वे ताकझांक नहीं करते, वे ही वास्तव में जी रहे हैं.
_ खुद को देखना शुरू करो, दूसरों को देखने और ताकझांक करने कि आदत अपने आप छूट जाएगी.!!
मन की यातनाएँ हों या छोटे-छोटे सुख—अंत में हम ही अकेले उनके हिस्सेदार होते हैं.
_ कभी लगता है काश कोई इन्हें बाँट ले…
_ पर यही तो सबसे अजीब-सी, लगभग मूर्खतापूर्ण चाह है—कि कोई हमारी गहराइयों को उठाए, समझे, सह ले.
_ इंसान दिल से कितना मासूम-भोला होता है.!!
अगर आपको किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है.. जो आपको रास्ता दिखाए, जहाँ आप जा सकें और खुद को पा सकें, तो आपको हमेशा कोई न कोई मिल ही जाएगा ;
_ वे आपके व्यक्तित्व को दर्शाने वाले लोगों के रूप में आ सकते हैं,
_ और आप देखेंगे कि खुद को बचाने के लिए आपको कुछ चीज़ें बदलने की ज़रूरत है.
_ कुछ लोग आपको बदलने के लिए आपकी ज़िंदगी में आते हैं ; हर कोई हमेशा के लिए नहीं बना रहता.
_ बेहतर होगा कि आप उन्हें ज़िंदगी के किसी मोड़ पर छोड़ दें.
_ और अगर उन्हें वापस आना है, तो वे आपके दिल तक पहुँचने का रास्ता याद रखेंगे, और अगर नहीं, तो उन्हें ऐसे भूल जाइए.. जैसे वे कोई अजनबी हों..
_ आपके जीवन में एक अंधकारमय दौर था.. लेकिन अब, जब आप सीढ़ियाँ चढ़ चुके हैं, तो आप देख सकते हैं कि उनके बिना भी ज़िंदगी कितनी चमकदार है.
_ उन्हें भूल जाइए और उस अँधेरे में वापस जाने का रास्ता भी भूल जाइए ; शायद कोई दूसरा रास्ता अपनाएँ ;
_ और अब, आप बिना किसी चीज़ या किसी की चिंता किए, शांति से अपने जीवन में प्रवेश कर सकते हैं.
_क्योंकि आप अपने आप में सुरक्षित हैं.
_ ऐसा लगेगा कि जैसे आप घर वापस आ गए हैं.
_ घर आप हैं, और अपने बारे में जानना सुकून देता है.!!
आप अंधेरे में थे, कोई टॉर्च लेकर आपकी जिंदगी में आया और उसने आपकी जिंदगी में उजाला कर दिया,
_ फिर आपने कई सालों तक उसी टॉर्च वाले उजाले के साथ जिंदगी गुजार ली,
_ लेकिन कभी ये नहीं सोचा कि मैं भी अपनी एक टॉर्च का इंतजाम कर लूं..
_ और फिर एक दिन वो फरिश्ता अपनी टॉर्च लेकर चला गया और आपकी जिंदगी में फिर से वहीं अंधेरा हो गया.
_ अंधेरा वहीं same hi है.. पर इस बार आपको ज्यादा अंधेरा फील होगा,
_ क्योंकि इस अंधेरे से पहले आपको उजाले में रहने की आदत पड़ गई थी.
Note: कोई आपके बुरे समय में आपकी मदद करे तो उस पर पूरी तरह निर्भर मत हो जाओ,
_ उसकी मदद करने के दौरान अपने समय को अच्छा बनाने के बारे में सोचते रहना जरूरी है..
_ वरना फरिश्ते के जाने पर आप पहले से अधिक बुरे वक्त में पहुंच जाओगे.!!
Q: हम लोगों पर इतना निर्भर क्यों रहते हैं ?
मुझे लगता है कि औरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.
Ans.: ये सवाल बहुत गहरा है और बहुत सच्चा भी.
_ हम दूसरों पर निर्भर क्यों रहते हैं ?
_ क्योंकि इंसान की आदत है कि जिसे वह खोने से डरता है, उसी पर सबसे ज़्यादा टिक जाता है.
_ कभी भावनात्मक सहारे के लिए, कभी मान्यता के लिए, कभी समझे जाने की चाह में.
_ पर धीरे–धीरे ये निर्भरता ही थकाने लगती है.
तो होना क्या चाहिए ?
1. भावनात्मक सहारा – अंदर से आए, बाहर से नहीं..
_ दूसरों की मौजूदगी अच्छी है, पर अपनी जड़ें अपनी ही मिट्टी में हों..- यह और भी अच्छा है.
2. रिश्ते रखें, पर बैसाखी न बनाएं..
_ लोग आपकी ज़रूरत पूरी कर सकते हैं, पर आपकी कमज़ोरी नहीं भर सकते..-
वो काम सिर्फ आप कर सकते हैं.
3. खुद की कंपनी से दोस्ती..
_ अगर आप अपनी खामोशी में सुकून महसूस करने लगते हैं,
तो दुनिया का कोई भी शोर आपको हिला नहीं सकता.
4. अपेक्षाएँ कम, सम्मान ज़्यादा..
_ रिश्ते तब खूबसूरत लगते हैं जब.. हम अपेक्षा में नहीं, अपनापन में जीते हैं.
5. ताकत अंदर से आती है, बाहर से नहीं..
_ जब आप खुद पर टिक जाते हैं.. तो कोई आ जाए या चला जाए,
आपका संतुलन नहीं टूटता.!!
“दूसरों का साथ अच्छा है, पर अपना सहारा जरुरी है..
_ वरना लोगों को बदलते देर नहीं लगाती, और हम टूटते देर नहीं लगाते”




