हम सभ्य हो गए.
_ अब हम चीख-चीख कर नहीं लड़ते
_ हल्की आवाज में भी नहीं लड़ते
_ मौन होकर अपनी अरुचि दर्शाते हैं.
_ अब हम ठहाके नहीं लगाते
_ हा हा, ही ही, हू हू नहीं करते
_ अब हम स्मित मुस्कान मुस्काते हैं.
_ अब हम किसी से शिकायत नहीं करते
_ पहले शिकायत करना अपनापन लगता था
_ अब शिकायत करने से
_ आदमी छोटा बनता है
_ हम छोटे क्यों बनें ?
_ शब्दों का इस्तेमाल कम हो गया है
_ खामोशी की मनहूसियत छाई रहती है.
_ वो चहकने का काल पुराना हुआ
_ अब हम आधुनिक हैं
_ खामोश, अकेलेपन को झेलते हुए.
_ लड़ते थे तो वातावरण में जान थी
_ शोरगुल की एक अपनी शान थी.
_ सभ्य क्या हुए
_ चहचहाने के पल अलभ्य हो गए.
– Manika Mohini



