बस यूँ ही…
रत्नेश अवस्थी
कोई जब मुझसे पूछे,
कैसे हो ?
तो मेरे “मैं ठीक हूँ” कहने पर,
तुम्हारा प्रश्न होता सच बताओ,
कई “बार मैं ठीक हूँ” कहने पर भी,
सबकुछ ठीक नही होता,
बहुत सारी बातें और उलझने सिमटी होती हैं,
एक छोटे से दिमाग और दिल में,
कई बार मन उकता चुका होता है,
इस दुनिया से लोगों से यहाँ तक कि अपने आप से भी,
उस समय केवल मौन और एकान्त ही भाता है,
शोर आपको चिड़चिड़ा बना देता है,
कभी – कभी खिलखिला कर हँसते हुए,
मन करता है कोई मुझसे पूछ लें,
तुम उदास क्यों हो ?
कई बार उदासी इतनी बेकाबू हो जाती है,
कि वो बाहर निकलते निकलते हँसी बन जाती है,
वो हँसी इतनी तेज होती है कि,
स्वयं के कान भी बहरे हो जाते हैं,
और जब मैं हँस रहा होता हूँ ठहाकों के साथ,
तभी काश ! तुम साथ होते तो कहते,
“सुनो ! तुम उदास क्यों हो ?”





