सुविचार 4800

आजकल सब कुछ सेट होने के बावजूद भी लगभग हम सभी अपसेट से ही रहते हैं. हर समय दिमाग़ में चिन्ता ही चल रही होती है. इसलिए हम निराश और हताश ज्यादा होते हैं.

जो हमें सहज मे मिलता है वह दूध के समान होता है और जो माँगने से मिलता है वह पानी के समान. लेकिन जो कलह करके, मनमुटाव करके ज़बरदस्ती हासिल किया जाता है वह तो रक्त के समान होता है.
जो खो गया है हमें उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि जो है उसका भरपूर आनंद लेना चाहिए. यदि हमारे दो दांत टूट भी गए तो क्या हुआ? बाकी तीस तो हैं. हम उन दो की याद में शेष को दरकिनार क्यों करें ?

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