** ऐसे कोई करता है क्या ?
_ हमारा घर उजड़ना केवल मेरा व्यक्तिगत नुकसान नहीं था,
_ यह पूरे रिश्ते और रिश्तेदारी के लिए आत्ममंथन का विषय और शर्म की बात होना चाहिए था.
पर हुआ क्या..
_ चुप्पी… या फिर धीमी-सी खुसरपुसर, जैसे यह सब सामान्य हो.
_ कभी मन में प्रश्न उठता है.. – क्या किसी की आत्मा को यह खटकता नहीं
कि किसी के साथ इतना अन्याय कैसे किया जा सकता है ?
_ गलत करना शायद आसान होता है, पर उस गलती का बोझ जीवन भर उठाना आसान नहीं होता.
_ उन्होंने मेरी ज़मीन नहीं छीनी, उन्होंने मेरा घर छीना है.
_ फिर सवाल आता है कि इस अन्याय के विरुद्ध कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया.
_ उत्तर साफ़ है..- ईर्ष्या, जलन और स्वार्थ.
_ किसी का घर उजाड़ देना.. इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता है ?
_ यह दायित्व केवल उन्हीं का नहीं.. जिन्होंने यह किया,
_ बल्कि उनका भी है, जो साथ खड़े रहे, जो तटस्थ बने रहे, और जो चुप रहकर तमाशा देखते रहे.
_ गलत का साथ देना भी एक कर्म है और कर्म अपना असर छोड़ता ही है.
_ मैंने सबको माफ़ किया है और सब कुछ समय पर छोड़ दिया है.
_ क्योंकि मुझे भरोसा है..- समय ही न्याय करता है, समय ही पूरी कहानी लिखता है.
_ आज भी सब खामोश हैं, मानो मैं कभी था ही नहीं, या मानो मेरा होना मायने ही नहीं रखता.
_ पर कोई भी स्थिति सदा नहीं रहती.
_ अंततः यही देखा जाता है कि किसने सही का साथ दिया.. और किसने नहीं.
_ अब यह बात कहना मेरे लिए ज़रूरी है..
_ आपके व्यवहार से मुझे कई बार गहरी मानसिक पीड़ा हुई.
_ मेरी चुप्पी यह संकेत नहीं थी कि मुझे दर्द नहीं हुआ, बल्कि यह कि मैं सहता रहा.
_ मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि.. जो हुआ, वह सही नहीं था.
_ और यह जानना मेरा अधिकार है कि इसके पीछे आपकी सोच या कारण क्या था.
_ यह शब्द आपको बदलने के लिए नहीं लिखे गए हैं, बल्कि अपने मन का बोझ हल्का करने के लिए..
_ अगर आप समझें.. तो अच्छा.
_ अगर न समझें..- तब भी मैंने अपनी बात रख दी.!!