_ परिवार, समाज, धर्म, शिक्षा, अनुभव, संस्कृति- इन सबने मिलकर हमारे भीतर सही-गलत की कई धारणाएँ बना दी हैं.
_ हम दूसरों को जज करने के लिए जिस मीटर का इस्तेमाल करते हैं,
कभी यह भी देखना चाहिए कि वह मीटर हमारे भीतर आया कहाँ से..
_ बचपन, परिवार, समाज, धर्म, शिक्षा और अपने अनुभव –
_ न जाने कितनी चीज़ों ने हमारे भीतर.. सही और गलत की परिभाषाएँ बना दी हैं.
_ फिर हम उसी पैमाने से लोगों को नापते हैं,
_ उनके लिए दायरे बनाते हैं और सर्टिफिकेट बाँटने लगते हैं –
_ यह अच्छा है, यह बुरा है ; यह सही है, यह गलत.
_ शायद समझदारी यह नहीं कि.. हम सही-गलत को ही छोड़ दें,
_ बल्कि यह समझें कि.. किसी इंसान को पूरी तरह समझे बिना,
_ उसके पूरे व्यक्तित्व पर फैसला सुनाना कितना आसान है.
_ इंसान अक्सर सिर्फ़ अच्छा या बुरा नहीं होता –
_ वह समय, परिस्थिति, जरूरत, चुनाव और अपने संस्कारों का
एक जटिल परिणाम होता है.
_ मैं कभी भी किसी को जज नही करता..
_ क्यूंकि मैं ये बात जानता हूं कि जज करने की इस प्रक्रिया में मेरी सोच यह साबित कर देती है कि मैं एक संकीर्ण मानसिकता का शिकार हूँ.
_ मेरे लिए कुछ सही, गलत नही है..
_ बल्कि जो है वो है समय, परिस्थिती, जरूरत है.!!