“तुलना” के खेल में नही “उलझना” चाहिए, क्योंकि इस “खेल” का कहीं कोई अंत नही
जहाँ “तुलना” की “शुरुआत” होती है वही से “आनंद” और “अपनापन” खत्म होता है..
कभी-कभी वे लोग, जो हजारों किलोमीटर दूर होते हैं,
_ अपने स्नेह, समझ और अपनत्व से हमें इतना करीब महसूस कराते हैं कि पास बैठे लोग भी उतनी गर्माहट नहीं दे पाते..
_ दूरी केवल जगहों की होती है, दिलों की नहीं और सच्चा जुड़ाव वही होता है, जहाँ बिना पास रहे भी अपनापन महसूस हो.!!
जिनके साथ हमें सच्चा अपनापन महसूस होता है, वहाँ दूरी या समय की कोई अहमियत नहीं रह जाती.!!





