Rahul Kumar Jha

मैंने जीवन में एक आदत बहुत देर से छोड़ी लोगों को देखकर उनके बारे में निर्णय बना लेना.

_ पहले मुझे लगता था कि जो दिखाई देता है, वही सच है.

_ जो व्यक्ति बार-बार एक ही रास्ते पर जाता है, वह उसी मंज़िल का मुसाफ़िर होगा.

_ जो लोगों की नज़रों में गलत है, वह सचमुच गलत ही होगा.

_ फिर जीवन ने मुझे सिखाया कि आँखें दृश्य देखती हैं, लेकिन सत्य नहीं._ सत्य अक्सर वहाँ रहता है, जहाँ हमारी नज़र पहुँचती ही नहीं.

_ तब से मैंने किसी भी इंसान पर अंतिम निर्णय देने से पहले अपने भीतर एक प्रश्न जगाना शुरू कर दिया…”क्या पता मैं गलत हूँ ?”

_ क्या पता जिस व्यक्ति को मैं पापी समझ रहा हूँ, वह किसी और के पापों का बोझ अपने सिर पर लेकर चल रहा हो.

_ क्या पता जिसे मैं स्वार्थी समझ रहा हूँ, उसने अपना सबसे सुंदर हिस्सा किसी अनजान इंसान की ज़िंदगी सँवारने में खर्च कर दिया हो.

_ क्या पता जिसे मैं गिरा हुआ मान रहा हूँ, वह किसी और को गिरने से बचाने के लिए स्वयं गिरा हुआ दिखाई देना स्वीकार कर चुका हो.

_ जीवन ने मुझे यह भी समझाया कि सबसे गहरे त्याग कभी मंचों पर नहीं होते.

_ उन पर तालियाँ नहीं बजतीं, उनके लिए समाचार नहीं लिखे जाते, उनके सम्मान में स्मारक नहीं बनते.

_ वे त्याग चुपचाप होते हैं…

_ इतने चुपचाप कि दुनिया उन्हें गलत समझ बैठती है.

_ हम अक्सर किसी इंसान की पूरी कहानी उसके जीवन के एक दृश्य से लिख देते हैं.

_ हम उसके संघर्ष नहीं देखते, केवल उसका परिणाम देखते हैं._ हम उसके घाव नहीं देखते, केवल उसका व्यवहार देखते हैं.

_ हम उसकी नीयत नहीं पढ़ते, केवल उसके कदमों का रास्ता देखते हैं.

_ और यहीं हम सबसे बड़ी भूल कर बैठते हैं.

_ क्योंकि संसार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी प्रतिष्ठा बचाने के बजाय किसी और की इज़्ज़त बचा लेते हैं.

_ वे सफ़ाई दे सकते हैं, लेकिन नहीं देते.

_ वे सच बता सकते हैं, लेकिन चुप रहते हैं.

_ वे सम्मान पा सकते हैं, लेकिन किसी और का भविष्य उनसे अधिक मूल्यवान होता है.

_ ऐसे लोग दुनिया की नज़रों में हार जाते हैं, लेकिन ईश्वर की दृष्टि में वही सबसे ऊँचे खड़े होते हैं.

_ अब मैं समझ चुका हूँ कि किसी इंसान की महानता इस बात से नहीं मापी जा सकती कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं.

_ महानता तो वहाँ जन्म लेती है, जहाँ कोई व्यक्ति सही काम करता रहता है, भले ही पूरी दुनिया उसे गलत समझती रहे.

_ इसलिए अब मैं किसी पर उँगली उठाने से पहले अपने भीतर झाँकता हूँ.

_ क्योंकि मैंने सीखा है कि निर्णय देना आसान है, समझना कठिन.

_ आरोप लगाना सरल है, करुणा रखना दुर्लभ.

_ और शायद मनुष्य की सबसे बड़ी परिपक्वता यही है कि वह हर चेहरे के पीछे छिपी उस अनकही कहानी की संभावना को कभी मरने न दे.

_ हो सकता है जिसे मैं आज दोष दे रहा हूँ, वही कल मेरी इंसानियत का सबसे बड़ा पाठ निकले.

_ इसलिए अब मैं लोगों को उनके बारे में सुनी हुई बातों से नहीं, बल्कि अपनी करुणा की आँखों से देखने की कोशिश करता हूँ.

_ क्योंकि जीवन ने मुझे एक ऐसा सत्य सिखाया है जो शायद हर युग में अमर रहेगा…

_ हर दिखाई देने वाला सत्य, पूरा सत्य नहीं होता.

_ और कई बार…

_ सबसे पवित्र आत्माएँ वही होती हैं, जिन्हें दुनिया सबसे पहले अपवित्र घोषित कर देती है.

Rahul Kumar Jha

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