मस्त विचार 4792
कुछ और कश लगा ले ऐ ज़िंदगी,,,
बुझ जाऊँगा किसी रोज़, सुलगते सुलगते…।
बुझ जाऊँगा किसी रोज़, सुलगते सुलगते…।
साँसों का भी कोई हिसाब रखता है क्या !!
आप भी कभी मुझे अपनाते तो अच्छा लगता !!
वरना मेरी उम्मीद बढ़ती ही जा रही थी..
#बस_ तू _साथ_दे_मेरा_मैं_अकेला_ही_काफी_हूँ..
कर्म की शाख को भी हिलाना पड़ता है..