मस्त विचार 4787
केवल ख्वाहिशों से नहीं गिरते फूल झोली में,
कर्म की शाख को भी हिलाना पड़ता है..
कर्म की शाख को भी हिलाना पड़ता है..
सोच रहा हूँ _ जब मिले थे तो _ कौन सा हुनर था मुझमें..
मैं स्नेह का धागा हूँ _ मजबूरी की जंजीर नहीं..!!
ख़ाक हूँ मैं, ख़ाक पर क्या ख़ाक इतरा के चलूँ..
ख़ुशी के लिये ही अब ये तलाश बंद कर दी.”