मस्त विचार 3841
उसी महफ़िल से मैं रोता हुआ आया हूँ ऐ ‘यारो’,
इशारे में जहाँ लाखों मुक़द्दर बदले जाते हैं..
इशारे में जहाँ लाखों मुक़द्दर बदले जाते हैं..
_ कुछ जबरदस्त, तो कुछ जबरदस्ती रो रहें होंगे..
_ फ़िर भी मैं रोज़ तेरी राह क्यूँ तकता हूँ.
_मैंने कितने आँसू बहाएं हैं तुम्हारे लिए…
_ पर कहीं न कहीं उंगली उठ जाती है अपनों पर..