मस्त विचार 3800
हम तो नरम पत्तों की शाख़ हुआ करते थे…
छीले इतने गए कि खंज़र हो गए…!!
छीले इतने गए कि खंज़र हो गए…!!
_ सब रोशन करने के लिए सूरज की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है.
_ जो सूर्य से प्रेम करता है वह दीपक से संतुष्ट नहीं होता.
बुरा बन गया हूं मै, मेरे अपनों की मेहरबानी है.
_जैसे चुभने की फ़िक्र में काँटा शाख़ से ख़ुद ही टूट जाता है.