मस्त विचार 3952
आधी ख्वाहिशें हम अपने अंदर ही मार देते हैं,
_आधी ख्वाहिशें ज़माना मुकम्मल होने नहीं देता..!!
आप ज़माना देख लो, मैं इधर ही ठीक हूँ..!!
_आधी ख्वाहिशें ज़माना मुकम्मल होने नहीं देता..!!
_समझदारी ने तो बहुत कुछ छीन लिया…
_देता था नया ज़ख्म वो रोज मेरी ख़ुशी के लिए..!!
रोज़ लिया करते हम थोड़ा थोड़ा..
वे सभी आपकी गलतियाँ नोटिस करते हैं..
_पर वो ‘काश’ जब सच में तब्दील होता है तो लगता है कि वो काश ‘काश’ ही रह जाता.
_ “पार” करना है या “इंतेज़ार” करना है..
दर्द की ज़िद है की दुनिया को खबर हो जाए..!
_मगर सबके पास खबर है..!