मस्त विचार 3674

कोई नहीं दुश्मन अपना, फिर भी परेशान हूँ मैं,

अपने ही क्यों दे रहे हैं जख्म, इस बात से हैरान हूँ मैं.

मस्त विचार 3673

लाजमी तो नहीं हर बार सज़ा गुनाह की ही मिले,

कभी – कभी ज्यादा नेकी भी सज़ा लाजवाब दिलाती है.

मस्त विचार 3672

मिलते रहे रुलाने वाले, हम बन गये हंसाने वाले.

मन से निर्मल हो नहीं पाते, रोज- रोज गंगा नहाने वाले.

मस्त विचार 3670

ठोकरें नहीं खाएंगे जनाब_ तो कैसे जानेंगे….

_ कि आप पत्थर के बने हैं या शीशे के.

शीशे के घरों पर अभी गरूर है तुम्हें, अभी तुमने उछलते पत्थर नहीं देखे.!!
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