मस्त विचार 3208
शहर के हर शख्स ने वसीयत में शराफ़त पाई है,
हैरान हूँ मैं सोचकर फिर बेईमानी कहां से आई है.
हैरान हूँ मैं सोचकर फिर बेईमानी कहां से आई है.
चाहे लोग कहे कुछ भी, तू तो जिम्मेदारी रख,
वक्त पड़े काम आने का, पहले अपनी बारी रख,
मुसीबते तो आएगी, पूरी अब तैयारी रख,
कामयाबी मिले ना मिले, जंग हौंसलों की जारी रख,
बोझ लगेंगे सब हल्के, मन को मत भारी रख,
मन जीता तो जग जीता, कायम अपनी खुद्दारी रख.
दुखी लोग इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि उनके पास क्या नहीं है.
यह ज़िन्दगी इतनी भी कठिन तो नही….
लेकिन अफसोस _ तब तक हम अपना ताला बदल चुके होते हैं…
वो खुद मिलने आयें _ नए नए बहाने से.