_ उन्हें बस एक ऐसा घर चाहिए, जहाँ सुबह की शुरुआत हँसी से हो.
_ जहाँ मुस्कुराहटें हों, फूलों खुशबू हो, न कि टूटे रिश्तों की चुभन और बिखरे बर्तनों की आवाज़.
_ उन्हें बस इतना चाहिए कि वे अपने काम पर खुशी से जाएँ.
_ जहाँ उन्हें सिर्फ़ काम निकालने का साधन न समझा जाए, बल्कि एक इंसान की तरह देखा जाए.
_ जहाँ उनकी बात इसलिए सुनी जाए कि उन्हें समझा जा सके, न कि उन्हें ग़लत साबित करने के लिए.
_ उन्हें ऐसी हवा भी चाहिए जिसमें टारगेट, डेडलाइन और चिंता की घुटन न हो, बल्कि बारिश के बाद भीगी मिट्टी की खुशबू हो, और बालकनी में खड़े होकर चाय पीते हुए गहरी साँस लेने की आज़ादी हो.
_ उन्हें इतना समय चाहिए कि किसी पार्क की बेंच पर बैठकर अपनी पसंदीदा किताब के कुछ पन्ने पढ़ सकें.
_ ऐसा कोना चाहिए जहाँ वे खुलकर गा सकें, नाच सकें, चित्र बना सकें, अपनी लिखी हुई बातें ज़ोर से पढ़ सकें, बिना इस डर के कि कोई उनका मज़ाक ना उड़ाए.
_ वे अपने माँ-बाप के अकेलेपन, दुख और टूटन को विरासत में नहीं पाना चाहते.
_ क्योंकि अकेलापन भी कई बार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चला जाता है.
_ फिर इंसान लोगों के बीच रहकर भी अकेला रह जाता है.
_ रातों को जागता है, ख़ाली बिस्तर पर करवटें बदलता है और सोचता रहता है- “आख़िर मेरे साथ ही क्यों ?”
_ कभी फ़ोन की स्क्रीन पर अनजान लोगों में अपनापन ढूँढ़ता है, सिर्फ़ इसलिए कि कुछ पल के लिए अकेलापन कम हो जाए.
_ कोई भी ऐसी ज़िंदगी नहीं चाहता.
_ लोग बस ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ बच्चों के चेहरों पर मिट्टी खेलते-खेलते लगे.
_ वे चाहते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय डर के साथ विदा न करें.
_ ख़ासकर बेटियों के लिए हर पल मन में उठने वाले डर और बुरे ख़यालों के साथ न जिएँ._ हर इंसान चाहता है कि उसकी ज़िंदगी का एक छोटा-सा हिस्सा सिर्फ़ उसका अपना हो.
_ कुछ सपने, कुछ पल, कुछ यादें- जिन्हें कोई उससे छीन न सके._ वे बस कभी-कभी रात भर आसमान के तारों को देखते रहना चाहते हैं.
_ बिना किसी जल्दी के.
_ बिना किसी चिंता के.
_ वे चाहते हैं कि नींद उन्हें लेटते ही आजाये, न कि अपने ही मन के शोर के बीच जागते रहें.!!
_ इसलिए नहीं कि मुझे अपने फैसलों पर भरोसा नहीं होता, बल्कि इसलिए कि हर फैसले के साथ एक दूसरी ज़िंदगी हमेशा के लिए छूट जाती है.
_ जब ज़िंदगी मेरे सामने दो रास्ते रखती है, दाएँ जाओ या बाएँ तो मेरा मन बस इतना चाहता है कि जाने से पहले दोनों रास्तों पर थोड़ा-सा आगे तक देख सकूँ.
– बस एक झलक.
_ इतना पता चल जाए कि अगर दाएँ गया तो क्या खोऊँगा, क्या पाऊँगा… और अगर बाएँ गया तो मेरी कहानी किस तरह बदल जाएगी.
– मैं भविष्य जानना नहीं चाहता.
_ मैं बस उन ज़िंदगियों को देखना चाहता हूँ, जो मेरे एक छोटे-से फैसले की वजह से कभी जी ही नहीं गईं.
_ कभी सोचता हूँ अगर उस दिन मैंने हाँ कह दी होती तो ?
_ क्या आज मेरी ज़िंदगी सच में अलग होती ?
_ अगर उस दिन मैंने चुप रहने के बजाय अपने लिए आवाज़ उठाई होती तो ?
_ क्या कुछ बदल जाता ?
_ अगर वो नौकरी चुन ली होती, वो शहर चुन लिया होता, वो इंसान चुन लिया होता, वो रिश्ता बचा लिया होता, या फिर उसे उसी दिन छोड़ दिया होता… तो आज मैं कौन होता ?
_ क्या मैं ज़्यादा खुश होता ?
_ या बस अलग तरह से परेशान ?
_ कभी-कभी मन करता है कि ज़िंदगी के किसी कोने में एक छोटा-सा दरवाज़ा हो.
_ ऐसा दरवाज़ा जिसे खोलकर मैं अपनी दूसरी ज़िंदगियों में झाँक सकूँ.
_ एक कमरे में वो मैं हो जिसने “हाँ” कहा था.
_ दूसरे कमरे में वो, जिसने “नहीं”,
_ कहीं वो मैं हो जो किसी और शहर में रहता है.
_ कहीं वो जो किसी और के साथ बूढ़ा हो रहा है.
_ कहीं वो जिसने वो जोखिम उठा लिया था जिससे मैं डर गया था.
_ और शायद किसी कमरे में वो भी हो जिसने मेरी तरह ही कोई फैसला लिया था, लेकिन आज भी सोचता है, काश, मैंने दूसरा रास्ता चुना होता.
_ शायद यही सबसे अजीब बात है इंसान होने की.
_ हम जिस ज़िंदगी को जी रहे होते हैं, उसके साथ-साथ उन सारी ज़िंदगियों को भी अपने भीतर कहीं चुपचाप ढोते रहते हैं, जिन्हें हम जी सकते थे.
– लेकिन फिर एक बात समझ आती है.
_ शायद हर रास्ते का अंत हमें पहले से दिख जाए, तो चुनाव का मतलब ही खत्म हो जाए.
_ क्योंकि ज़िंदगी शायद सही रास्ता चुनने का नाम नहीं है.
_ ज़िंदगी उस रास्ते को अपना बनाने का नाम है जिसे हमने चुन लिया.
_ लेकिन शायद उन्होंने जो बात हमें नहीं बताई, वो ये है कि इंसान उम्र भर कभी-कभी पीछे मुड़कर उन दोनों रास्तों को देखता रहता है.
_ सोचता है अगर मैं उस तरफ चला होता तो ?
_ और शायद इस सवाल का कोई जवाब कभी नहीं मिलेगा, शायद मिलना भी नहीं चाहिए.
_ क्योंकि अगर हमें हर “क्या होता अगर” का जवाब मिल जाए, तो हम अपनी आज की ज़िंदगी को कभी पूरी तरह जी ही नहीं पाएँगे.
– फिर भी…
_ काश, ज़िंदगी मुझे सिर्फ पाँच मिनट देती.
_ बस पाँच मिनट.
_ मैं अपने उन सारे रूपों से मिलना चाहता, जो मैं हो सकता था.
_ मैं उनसे पूछना चाहता कि क्या वे मुझसे ज़्यादा खुश हैं.
_ क्या उन्हें भी कभी मेरी ज़िंदगी की याद आती है ?
_ क्या उन्हें भी कभी लगता है, कि काश, मैंने वो दूसरा रास्ता चुना होता… और फिर शायद मैं वापस लौट आता.
_ अपने इसी जीवन में.
_ उसी इंसान के पास.
_ उसी अधूरी कहानी के बीच.
– और इस बार शायद मुझे अपने फैसलों से शिकायत न होती.
_ क्योंकि मैंने देख लिया होता कि दूसरी ज़िंदगी भी आखिर एक ज़िंदगी ही थी, उसमें भी कुछ खुशियाँ थीं, कुछ पछतावे थे, कुछ लोग मिले थे, कुछ लोग छूटे थे… और कुछ सवाल वहाँ भी अनुत्तरित थे.
_ तब शायद मैं समझ पाता कि हमें दूसरी ज़िंदगी की ज़रूरत नहीं होती.
_ हमें बस अपनी इस ज़िंदगी को देखकर ये यक़ीन करने की ज़रूरत होती है कि जो नहीं हुआ, वो ज़रूरी नहीं कि बेहतर होता.
_ और जो हो गया है…शायद उसे बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी अब हमारी है.
_ इसलिए आज भी जब ज़िंदगी मेरे सामने दो रास्ते रखती है, मेरा मन उस पुराने दरवाज़े को ढूँढता है.
_ लेकिन अब मैं शायद बिना खोले ही आगे बढ़ जाऊँगा.
_ क्योंकि हर रास्ते के आगे क्या है, ये जान लेना ज़िंदगी नहीं है.
_ अनजान रास्ते पर अपने कदमों से एक नयी कहानी लिख देना, शायद यही ज़िंदगी है.



