मस्त विचार 2935

फैसला ये है कि अब आवाज भी नहीं देनी किसी को…

_ हम भी तो देखें, कौन कितना तलबगार है हमारा…

अब मैं तेरे लिए खामोश हूँ, जो कभी “मैं मेरा तलबगार था”

_ ये बात अब भी मुझे याद है कि “तू कभी मेरा प्यार था”

मस्त विचार 2934

उजाले के लिए काफी नही है सूरज का निकल आना,

_ यह भी जरूरी है कि आंखें खुली रहे.

किसी दिन जब सूरज बादलों के पीछे छिप जाया करता है और दिनभर नहीं निकलता तो.. हमें उतना फर्क नहीं पड़ता..

_ जितना कि घर की बिजली एक दिन के लिए गुल हो जाने पर हम चिड़चिड़े से हो जाते हैं,
_ न मिल के भी उदास नहीं करती हैं पहुँच से दूर की चीजें, कचोटती वो हैं जो पास में होकर भी न मिले…!
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