मस्त विचार 2574
रोज गुनाह करता हूँ वो छुपाता है अपनी रहमत से,
मैं मजबूर अपनी आदत से वो मशहूर अपनी रहमत से.
मैं मजबूर अपनी आदत से वो मशहूर अपनी रहमत से.
लेकिन चोट खा कर किसी को माफ़ करना बड़ा मुश्किल है.
“अनचाहा” सुनंने की ताकत होनी चाहिए.
सब से ज्यादा खुद का ही दिल दुखाया है दूसरों को खुश करने में.
सोचा कुछ, किया कुछ, हुआ कुछ, मिला कुछ…
जिंदगी आज तेरी खमोशी के चर्चे हैं…