मस्त विचार 2373
ऐ ज़िन्दगी अपनी शर्तों में थोड़ी सी ढील दे दे,
हम बड़े हुए तो क्या, थोड़ा हमें भी बच्चों सा सुकून दे दे.
हम बड़े हुए तो क्या, थोड़ा हमें भी बच्चों सा सुकून दे दे.
जिन पर चढ़ कर कभी तुम दुनिया देखा करते थे…
मेरे अपने ही हर दिन मुझको थोड़ा- थोड़ा काटते रहे…
कुछ पराये अपने हुए, कुछ अपनों का रंग बदलता रहा…
एक वो जिनकी उम्र अधिक है,
दूसरे वो जिसने कम उम्र में ही बहुत सी ठोकरें खायी हैं…
लिखा तो है सफ़र मगर मंज़िल का निशान नहीं.