मस्त विचार 2320
ख़त जो लिखा मैनें इंसानियत के पते पर
डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते !
डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते !
ज़मीन वाले आप का कुछ नही बिगाड़ सकते…
और आसान करने के लिए समझना पड़ता है.
और रिश्तों का मतलब समझ आएगा.
कितने रस्ते वो बदलता है उसे पाने के लिए…..
वरना मेरी सलामती की दुआ कौन करेगा ?