मस्त विचार 2124
जिन्दगी का फलसफा भी कितना अजीब है,
शामें कटती नही और साल गुजरते जा रहे हैं.
शामें कटती नही और साल गुजरते जा रहे हैं.
चौखट पर बैठा है मगर द्वार खोलता नहीं है,
नाराज़ है किसी से या है इंतज़ार में किसी के,
क्यों खामोशियों को अपनी वो तोड़ता नहीं है,
कौन से वादे ने उसका किया है ऐसा हाल,
बुराई तो करता है उसकी मगर कोसता नहीं है.
मिट्टी का बना हूँ गुरूर जचता नहीं मुझ पर…
*तुम सुनो ना सुनो,* *मै तुम्हे यूँही पुकारा करूँ…*
*तुम मिलो ना मिलों,* मै तुम्हे यूँही पाना चाहूँ….*
*तुम कहो ना कहो,* *मै तुम्हे यूँही सुना करूँ……*
*तुम देखो ना देखो,* *मै तुम्हे बस निहारा करूँ…*
अपने भीतर अपने आप को………”
मंजिल को दायरे से निकल कर तलाश कर.