मस्त विचार 1963
होंठों को लिबास की ज़रूरत थी, _मैंने मुस्कुराहट पहना दी.!!
होंठों को सी चुके तो ..लोगों ने ये कहा..
_यूँ चुप से क्यूँ हो ..अजी कुछ तो बोलिए..
_यूँ चुप से क्यूँ हो ..अजी कुछ तो बोलिए..
…….बेहतरीन को खो देते हैं.
छोटी सी चादर से उम्मीदें बड़ी रखता हूँ…
क्योंकि, अपनों के बिना जीवन में सपनों का कोई मोल नहीं होता.
क्योंकि फिटकरी और मिश्री एक जैसे ही नजर आते हैं.
ये फैसला हर बार सामने वाले पे छोड़ा मैंने…