मस्त विचार 1886
“ऐ बुरे वक़्त” जरा तेज चल…
देख उस मोड़ को,,,वहां से तू बदलने वाला है.
देख उस मोड़ को,,,वहां से तू बदलने वाला है.
खुद के अंदर झांकने में क्युं अटकता हूं,
बाँध के झूले भ्रम के क्युं लटकता हूं,
क्या वजह है जो मैं खुद को यू खटकता हूं..
कि हम कैसी ज़मीने और ज़माना छोड़ आए हैं…!!
लेकिन जिनके पास धन नही वो धनी को बुरा बोलते हैं.
इसलिए धन को सही या गलत पर निर्णय देना गलत है …. असली रोग “”जलन”” है.
यही मन की आंखे खोलता है और रास्ता दिखाता है.