मस्त विचार 1961
कभी सिर तो कभी पाँव अपने ढंकता हूँ,
छोटी सी चादर से उम्मीदें बड़ी रखता हूँ…
छोटी सी चादर से उम्मीदें बड़ी रखता हूँ…
क्योंकि, अपनों के बिना जीवन में सपनों का कोई मोल नहीं होता.
क्योंकि फिटकरी और मिश्री एक जैसे ही नजर आते हैं.
ये फैसला हर बार सामने वाले पे छोड़ा मैंने…
क्योंकि खुशियों के तो दावेदार बहुत हैं.
क्या हमें इसे हलके में लेना चाहिए ?