मस्त विचार – फिर बच्चा बनना चाहता हूँ – 1670

फिर बच्चा बनना चाहता हूँ

मैं फिर से बच्चा बनना चाहता हूँ,

अपनी जिद पूरी ना होने पर,

जोर जोर से रो रोकर,

आसमान सिर पर उठाना चाहता हूँ।

बोर हो गया घर की इन रँगीन दीवारों से,

फिर पेन्सिल से इन पर उल्टे सीधे

चित्र बनाना चाहता हुँ।

वो मास्टरजी के ट्यूशन के भय से,

फिर सिर दर्द का बहाना लेकर,

बीमार हो जाना चाहता हूँ।

याद आ रहे हैं वो गिल्ली डंडे,

कबड्डी और पिट्ठू खेलना,

फिर गेंद पर मिट्टी लगाकर,

किसी के कपड़े गन्दे करना चाहता हूँ,

दोस्तों के साथ उस घड़घड़ाती स्टेट बस में,

फिर स्कूल जाना चाहता हूँ,

दोस्तों के टिफ़िन चुरा कर खाना चाहता हूँ।

नहीँ रुकती ठण्ड इन महँगे महँगे कम्बलों में,

वो सूती कपड़े की ऊनी रजाई में,

भाईयों के संग फिर दुबक कर,

मैं सोना चाहता हूं।

इन कोलार्जे तस्वीरों में ,

कहीँ सुंदरता नहीं दिखती,

मैं फिर से उन काली सफेद तस्वीरों में,

परिवार के साथ कैद हो जाना चाहता हूँ ।

उम्र के इस पड़ाव पर आकर,

फिर बचपन मे लौटना चाहता हूँ,

मैं फिर से बच्चा बनना चाहता हूँ।।

।। पीके ।।

मस्त विचार 1668

एक मुख़्तसर सी वजह है, मेरे अदब से मिलने की…

मिट्टी का बना हूँ, गुरुर जँचता नहीं मुझ पर ….!!

मस्त विचार 1667

अगर आप अच्छी रोटी कमा रहें हैं,

_ तो मक्खन लगाने वाले खुद ब खुद आ जायेंगे.

बाकि सब तो ठीक है.. लेकिन, अभी रोटी के वास्ते आटा तो ख़रीद लूं..!!

मस्त विचार 1666

मान सम्मान हो या प्यार हो, ये कभी भी मांगने से नहीं मिलते.

ये वो पूंजी है जिसे कमाना पड़ता है और ये पूंजी वही कमा पाता है,

जो दूसरों पर भी यही खर्च करता है.

error: Content is protected