मस्त विचार 1332

गलतफहमियों के सिलसिले इतने दिलचस्प होते हैं कि….

हर ईंट सोचती है, दीवार मुझ पर टिकी है.

मस्त विचार 1330

किसी से डरते क्यों हो ?

दबा के मन की बात, मौन तुम धरते क्यों हो ?

शरीर में मुहं में जिह्वा, खुल कर अपनी बात कहो.

मरने पर चुप रहना, जिन्दा मरते क्यों हो ?

अरे, भले तुम से तो “मूर्ख” ही लगते हैं.

भले निरर्थक सही, मगर कुछ कहते हैं.

तुम सुशिछित होकर, भला हिचकते क्यों हो ?

चलो होंठ खोलो, अब यह संकोच हटाओ.

बोल उठो, मृदु बोलो, सफल तुम भी कहलाओ.

उठो, भरो हुंकार, समर से हटते क्यों हो ?

किसी से डरते क्यों हो ?

मस्त विचार 1329

इंसान पूरी जिंदगी वह करने में बिता देता है जो हो नहीं सकता “दूसरों को बदलना”

पर वह नहीं करता जो हो सकता है “खुद को बदलना”..

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