मस्त विचार 1330

किसी से डरते क्यों हो ?

दबा के मन की बात, मौन तुम धरते क्यों हो ?

शरीर में मुहं में जिह्वा, खुल कर अपनी बात कहो.

मरने पर चुप रहना, जिन्दा मरते क्यों हो ?

अरे, भले तुम से तो “मूर्ख” ही लगते हैं.

भले निरर्थक सही, मगर कुछ कहते हैं.

तुम सुशिछित होकर, भला हिचकते क्यों हो ?

चलो होंठ खोलो, अब यह संकोच हटाओ.

बोल उठो, मृदु बोलो, सफल तुम भी कहलाओ.

उठो, भरो हुंकार, समर से हटते क्यों हो ?

किसी से डरते क्यों हो ?

मस्त विचार 1329

इंसान पूरी जिंदगी वह करने में बिता देता है जो हो नहीं सकता “दूसरों को बदलना”

पर वह नहीं करता जो हो सकता है “खुद को बदलना”..

मस्त विचार 1328

छोटी छोटी खुशियां ही तो जीने का सहारा होती है..

ख्वाहिशों का क्या वो तो पल पल बदलती रहती है..

error: Content is protected