मस्त विचार 1331
वक़्त लेता है करवटें न जाने कैसी- कैसी.
उम्र इतनी तो न थी जितने सबक सीख लिए हमने.
उम्र इतनी तो न थी जितने सबक सीख लिए हमने.
दबा के मन की बात, मौन तुम धरते क्यों हो ?
शरीर में मुहं में जिह्वा, खुल कर अपनी बात कहो.
मरने पर चुप रहना, जिन्दा मरते क्यों हो ?
अरे, भले तुम से तो “मूर्ख” ही लगते हैं.
भले निरर्थक सही, मगर कुछ कहते हैं.
तुम सुशिछित होकर, भला हिचकते क्यों हो ?
चलो होंठ खोलो, अब यह संकोच हटाओ.
बोल उठो, मृदु बोलो, सफल तुम भी कहलाओ.
उठो, भरो हुंकार, समर से हटते क्यों हो ?
किसी से डरते क्यों हो ?
पर वह नहीं करता जो हो सकता है “खुद को बदलना”..
ख्वाहिशों का क्या वो तो पल पल बदलती रहती है..
कि इल्जाम झूठे भले हैं पर लगाये तो तुमने हैं….
तो उससे छीनने का प्रयास भी न करो.