मस्त विचार 1202
ए बुरे वक़्त ! ज़रा “अदब” से पेश आ !!
“वक़्त” ही कितना लगता है “वक़्त” बदलने में…
“वक़्त” ही कितना लगता है “वक़्त” बदलने में…
जिन मसलों का हल नहीं, उसे समय पर छोड़.
इतना नहीं कि जितना रुलाता है आदमी;
माना गले से सब को लगाता है आदमी;
दिल में किसी-किसी को बिठाता है आदमी;
सुख में लिहाफ़ ओढ़ के सोता है चैन से;
दुख में हमेशा शोर मचाता है आदमी;
हर आदमी की ज़ात अजीब-ओ- गरीब है;
कब आदमी को दोस्तो! भाता है आदमी;
दुनिया से ख़ाली हाथ कभी लौटता नहीं;
कुछ राज़ अपने साथ ले जाता है आदमी………!!!!
लोग तसल्लियां तो देते हैं पर साथ नहीं….
जो तेज भागते हैं, उन्हें ठोकर लगती है.
रास्ता है गर सही, तो मंजिल भी पास है.