मस्त विचार 4469
*ये कश्मकश है ज़िंदगी की,* *कि कैसे बसर करें?*
*चादर बड़ी करें या,* *ख़्वाहिशे दफ़न करें !*
*चादर बड़ी करें या,* *ख़्वाहिशे दफ़न करें !*
पहले मुड़ कर देखते थे..,अब देख कर मुड़ जाते हैं ।
इसीलिए बाकी नहीं, अब कोई भी आस.
जो घड़ी जी लेंगे वो ही रह जानी है.
_ सच ही कहूंगा, क्यूं इतना घबरा रहे हो.!!
वरना बुरे कल भी नहीं थे और अच्छे आज भी नहीं..