मस्त विचार 833

क्या क्या न कहा लोगों ने

मगर यकीन हम ने तो अपने यकीन पे किया

बाहर से टूटता रहा सब

पर भीतर से एक शीशा भी हम ने तड़कने न दिया.

मस्त विचार 830

खुद से भी रूबरू कभी करा दे मेरे मालिक मुझ को…….

कब तक यूँ परायों में अपने होने के निशां ढूंढता फिरूँ……..

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