Kaynat
_ मैं तो अपने किरदार में ही रहना चाहता था और चाहता हूँ,
_ पर क्या करूँ ? लोग मुखौटा मांगते और चाहते हैं.
_ कभी-कभी लगता है, मेरा अपना असली रूप ही लोगों को कम पड़ जाता है.
_ मैं जितना सरल होकर जीना चाहता हूँ — उतना ही दुनिया मुझे किसी और रूप में देखना चाहती है.
_ लोग अक्सर मुखौटे मांगते हैं, क्योंकि सच्चाई उन्हें असहज कर देती है.
_ और मैं अपने किरदार में रहना चाहता हूँ, क्योंकि वही मेरा सत्य है, वही मेरा सुकून है.
_ शायद यही संघर्ष है..- दुनिया की अपेक्षाओं और अपने भीतर की सच्चाई के बीच.
_ लेकिन दिन के अंत में, मैं खुद से यही पूछता हूँ :
_ क्या मैं अपनी आत्मा के प्रति ईमानदार हूँ ?
_ अगर हाँ…- तो भले ही दुनिया मुखौटे चाहे,
_ मैं अपने किरदार में ही रहूँगा… क्योंकि वही मेरा घर है.!!
_ लोग वहीं सोचेंगे जो उनके मन में होगा.!!
_ न कोई ज्यादा इस्तमाल करे.. न कोई आपके बिना रह सके.!!
_ जब दर्द बहुत होता है, तो दिमाग पूरी ज़िंदगी को दर्द के रंग में रंग देता है.
_ लेकिन : दर्द स्थायी नहीं है.. कारण पहचाना जा चुका है, समाधान कल तय है.
_ अभी जो विचार आ रहे हैं, वो दर्द के साथ आए हुए मेहमान हैं..- “वो मैं नहीं”
_ मुझे इतनी समझ होने के बाद भी मैं इतना टूट क्यों रहा हूँ ?
_ क्योंकि समझ दिमाग की ताकत है और दर्द नर्वस सिस्टम की..
_ दुःख- बीमारी ज़िन्दगी को बुरा नहीं बनाते, बस उसे कुछ समय के लिए धुंधला कर देते है.. ‘और धुंध छँटती है’
_ और जिस दिन वह अपनी तकलीफ़ के खिलाफ खड़ा होता है, लोग उसके बदलाव का कारण अपने भीतर नहीं देखते.
_ वे यह नहीं कहते कि “शायद हमारे ही व्यवहार ने इसे चोट पहुँचाई”…
_ बल्कि बड़ी आसानी से कह देते हैं..- “हमें तो पहले से पता था ये ऐसा ही है”
– ” दूसरों के बदलने पर निर्णय देने से पहले, अपने बर्ताव की भूमिका को देखना जरूरी है, क्योंकि हर बगावत की जड़ में एक लंबी, अनदेखी सहनशीलता छिपी होती है.”
_ पर मेरी चिंता यह है कि.. इस अँधेरे को ही लोग रोशनी बताते हैं..!!
_ कभी-कभी लगता है कि मेरी नज़र जिस अँधेरे को साफ़-साफ़ पहचान रही है, वही अँधेरा लोगों की नज़रों में रोशनी बनकर खड़ा है.
_ और यही जगह सबसे थकाने वाली है..- जब सच मुझ पर भारी हो, पर बाकी लोग उसी को उजाला कहकर चैन से जी रहे हों.
– मैं बस इतना लिख सकता हूँ :
“क्या मैं गलत देख रहा हूँ, या लोग देखने से इंकार कर चुके हैं ?”
_ शायद जवाब समय बताए, पर अभी के लिए..
_ मैं वही देखूँगा जो सच्चा है, भले ही वो अँधेरा ही क्यों न हो.!!
_ मगर उन्हें ये नहीं पता कि मेहनत जानलेवा थी.!
– “लोग मेरी मंज़िल देखते हैं, मेरा रास्ता नहीं.
_ उन्हें चमक दिखती है, वह अँधेरा नहीं जिसमें रोज़ खुद को घसीटकर आगे बढ़ाना पड़ा.
_ नसीब जैसा जो दिखता है… वह असल में उन अनगिनत थकानों, टूटनों और फिर संभलने की कोशिशों का परिणाम है.
_ मेहनत ने मुझे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मारा भी… और गढ़ा भी.
_ _ आज जो मैं हूँ, वह किसी सौभाग्य का नहीं, मेरे संघर्षों का फल है.”
_ वह अपने जीवन को अपने तरीके से जीने का सामर्थ्य रखता है.”
_ अक्सर चोट अंजान लोगों से नहीं, अपने कहे जाने वालों से लगती है.
_ क्योंकि जो लोग आपको बचपन से जानते हैं, वे आपको बदलते हुए देखने के आदी नहीं होते.
_ इसलिए जब आप हटकर जीने लगते हैं, बहस से दूरी रखते हैं, और अपने ढंग से सोचते हैं, तो उन्हें लगता है.. आप उनसे दूर हो गए, अजीब हो गए, या अहंकारी हो गए.
_ जबकि हकीकत यह है..- आपने सिर्फ अपनी सीमा पहचान ली है.
_ रिश्तेदारों के साथ यह और कठिन होता है, क्योंकि वे आपको समझना नहीं, पहचान के पुराने साँचे में फिट करना चाहते हैं.
_ इसलिए यहाँ एक शांत तरीका काम आता है :
_ उन्हें बदलने-समझाने की कोशिश मत कीजिए.
_ और यह स्वीकार कर लीजिए कि.. हर रिश्ता गहराई के लिए नहीं होता.
_ आपका काम है, अपना आत्मसम्मान बनाए रखना.!!
_ मुझे कुछ भी ठीक करने की ज़रूरत नहीं..- बस देखना है, और छोड़ देना..!!
_ हमें “क्या करना चाहिए”.. या “क्या नहीं करना चाहिए”- वो दिखना चाहिए..
1) अक्सर “क्या नहीं करना है” ज़्यादा साफ़ दिखता है.
_ क्योंकि : जो चीज़ मन को अशांत करे, बोझिल बनाए, झूठी लगे..- वो तुरंत महसूस हो जाती है.
_ गलत दिशा पहले पहचान में आती है, सही रास्ता धीरे-धीरे खुलता है,,
_ इसलिए जीवन में शुरुआत अक्सर ऐसे होती है :- यह नहीं, यह भी नहीं, यह भी नहीं… और इसी छँटाई से रास्ता बनता है.
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2) फिर “क्या करना है” कब दिखता है ?
_ जब : गैरज़रूरी चीज़ें हट जाती हैं.
_ शोर कम होता है, तुलना और साबित करने की चाह ढीली पड़ती है.
_ तब जो बचता है.. वही आपका काम बन जाता है.
_ उसके लिए ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती..- वो अपने आप खिंचता है.
_ रास्ता दिखने से पहले, भटकन का बोझ उतरना ज़रूरी है.
_ हमारी परिपक्वता यही होनी चाहिए कि करने की लिस्ट से ज़्यादा, न करने की स्पष्टता खोजें.
_ और यही खोज धीरे-धीरे हमें “स्वाभाविक जीवन” तक पहुंचाती है.!!
इस वाक्य का सरल और स्पष्ट अर्थ :
“एक बार पहचानने की नज़र मिल जाए…”
यहाँ पहचानने की नज़र का मतलब है — सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से देखना.
_ जैसे अचानक कोई चीज़ “समझ में” नहीं, बल्कि “दिख” जाए.
“…अस्तित्व की अनुकंपा से…” _ यानि यह केवल कोशिश से नहीं होता. _ जब मन थोड़ा शांत, खुला और ग्रहणशील होता है — तो जैसे जीवन खुद ही अपने रहस्य की झलक दे देता है. _ इसे कृपा, अनुग्रह, grace कह सकते हैं. “…तो फिर कभी भूल नहीं होती है.”
मतलब —
_ जब एक बार सच्चा अनुभव हो जाए, तो वह सिर्फ स्मृति नहीं रहता, _ वह आपकी दृष्टि का हिस्सा बन जाता है.
इसे ऐसे समझें:
_ अगर कोई आपको सौ बार बताए कि आग गरम होती है, तो वह जानकारी है.
_ पर एक बार हाथ जल जाए — फिर आपको याद रखने की ज़रूरत नहीं.
_ वह “ज्ञान” नहीं, “सीधा अनुभव” है.
इस वाक्य का सार :
_ जब जीवन की सच्चाई एक बार भीतर से देख ली जाती है, तो फिर उसे बार-बार याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती — वह आपकी दृष्टि बन जाती है.
_ यह बात ज़्यादा दार्शनिक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य है. और अनुभव का असर स्थायी होता है.!!
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Musafir
—”मैं लोगों को ऐसे देखता हूँ, जैसे कोई पर्यटक इमारतों को…”
_ मैं अब लोगों को सिर्फ देखता हूँ — जैसे कोई पुरानी इमारतें देखता है.
_ हर चेहरा एक नक्शा है, हर मुस्कान में कोई पुराना रंग.
_ कोई बहुत ऊँचा लगता है —पर भीतर खाली.
_ कोई बहुत सजा-संवरा —पर आत्मा उजड़ी.
_ मैं देखता हूँ…पर अब छूता नहीं, जुड़ता नहीं..
—जैसे कोई पर्यटक तस्वीरें खींचता है, पर उन दीवारों में कभी नहीं बसता.!!
_ जहाँ कुछ साबित नहीं करना, कुछ पकड़ कर रखना नहीं, बस होना ही काफ़ी है.
_ शरीर दुनिया में चलता है, और मैं भीतर शांति में ठहरा रहता हूँ”
“शायद मैं कहीं गया नहीं..- बस भीतर लौट आया हूँ”
_ इसलिए मैं एक बार फैसला लेने के बाद वापस पलटकर नही देखता.!!
“दिमाग बोला – सोच ले पहले,” “दिल बोला – महसूस कर ले…”
_ मन खड़ा था दो राहों पर, एक थी शांति – एक थी उलझन से भरी..
_ जब मन ने दिल की धड़कन सुनी, चुप सा हो गया..
_ ना सोच, ना डर, ना कोई बात थी, सिर्फ एक गहरा, मौन का साथ था.
तब समझा–
_ मन वही है, जिसका रुख जैसा हो जाये,
_ या तो साथी बन जाए, या तो भटकता ही जाए.!!
_ एक-एक पल में डूब कर,
_ जैसे नदी अपने ही किनारे से बात कर रही हो.
_ ना मंजिल की चिंता है, ना रास्ते की गिनती –
_ सिर्फ एक साथी हूं… इस जीवन की एक सुंदर यात्रा में.!!
_ सड़क किनारे खिला मैं, ना कोई चाह, ना कोई गिला मैं..
_ राहगीर रुकें या न रुकें, अपनी ख़ुशबू से ही मिला मैं.!!
_ अब मैं थोड़ा रुकता हूँ, थोड़ा सुनता हूँ, थोड़ा झांकता हूँ अपने अंदर..
_ मैं किसी को दिखाने के लिए नहीं जी रहा..
_ मैं किसी को मनाना भी नहीं चाहता..
_ मैं अब खुद के और पास आ रहा हूँ..
_ और ये यात्रा अपने आप में पवित्र है.!!
_ कभी किसी एक सवाल का बोझ इतना भारी हो जाता है कि..
_ ना नींद चैन देती है, ना कोई अपनापन सुकून देता है.
_शरीर थक जाता है, पर मन जागता रहता है —
_ एक ही सवाल लिए: “आख़िर क्यों ?”,
_ “आख़िर क्या है इसका अर्थ ?”
_ और जब तक उस सवाल का जवाब नहीं मिलता,
_ ज़िन्दगी अधूरी सी लगती है… जैसे कुछ रुका हुआ है,
_ जैसे कोई गहरी गाँठ.. अब तक नहीं खुली.
— ये दर्द आत्मा का होता है —
_ कोई बाहर से नहीं देख पाता, पर भीतर लगातार चलता रहता है —
_ कभी अंधेरे की तरह, कभी सन्नाटे की तरह.
_ और जब जवाब मिलता है —
_ तो कभी वो आँखों से नहीं, आँसुओं से समझ आता है.
_ मन कहता है — “अब मैं जान गया… और अब मैं थोड़ा हल्का हूँ”
— “कभी-कभी जवाब पाने की तड़प ही हमें अपने भीतर गहराई तक ले जाती है —
_ जहां से न सिर्फ जवाब मिलते हैं… बल्कि एक नया मैं जन्म लेता है.”
_ और मुझे महसूस होता है कि शब्दों से ज्यादा एक मौन मुझसे बात करता है.”
– किसी ने पूछा क्या तुम सच में समझते हो ? _ मैंने कहा – “नहीं, पर मैं तुम्हारे साथ मौन बैठ सकता हूँ”
_ आईने में दिखता है
_ वही चेहरा —
_ वो ही आँखें, वो ही मुस्कान
_ पर अंदर कोई चुप है…
_ कुछ थमा हुआ है.
_ कभी जोश था,
_ हर सुबह एक लड़ाई का एलान करती थी
_ अब सुबह आती है…
_ पर उठने की कोई वजह नहीं ढूंढती.
_ सपने थे, सीने में धड़कते,
_ अब अलमारी में रखी फाइलों जैसे
_ कभी खुले तो धूल उड़ती है,
_ आँखें जलती हैं — पर आंसू नहीं आते.
_ रिश्ते हैं, नाम हैं,
_ पर मैं कहीं इन सबसे अलग हो गया हूँ,
_ शक्ल वही है —
_ पर मैं शायद अब ‘मैं’ नहीं हूँ’
— मन ने धीरे से कहा — ‘शायद अब तुझे खुद से मिलना बाकी है’
_ शायद अब फिर से चलने का वक्त है — उस रास्ते पर “जो कहीं खो गया था”
“मैं अब भी वही हूँ… पर शायद नहीं”
_ पर उसने चुना अपने धुंधले से अस्तित्व के भीतर देखना..!
— बाहर की सुंदरता आकर्षक है, फिर भी मन भीतर झांकने को लालायित रहता है. —
🪞 “बाहरी खिड़की से भीतर की ओर”
वो खिड़की खोल सकता था —
_ जहां सूरज की किरणें थीं, हरियाली थी, उड़ते परिंदे थे,
_ जहां जीवन बाहरी सौंदर्य की तरह मुस्कुरा रहा था.
पर उसने चुना — उस अस्तित्व के भीतर देखना, जहां धुंध थी, चुप्पी थी,
_ कभी समझ न आए ऐसे सवाल थे.
क्यों ???
क्योंकि वो जानता था — बाहर की रोशनी तभी सुंदर है.
_ जब भीतर का अंधेरा स्वीकार लिया जाए.
वो जानता था — कि खिड़की खोलने से पहले..
_ दरवाज़ा अपने भीतर का खोलना ज़रूरी है.
_ वो देखने चला था उस “मैं” को..
_ जो अक्सर भीड़ में गुम हो जाता है.!!
आज मन में कुछ अनोखा घटा,
शब्दों से परे, पर आत्मा से जुड़ा।
जैसे किसी ने फिर से जीवन दिया हो,
जैसे कोई अदृश्य करुणा मुझे छू गई हो।
एक पल को लगा —
जो मैं था, वो पीछे छूट गया।
और जो अब हूँ,
वो कोई नया, शुद्ध, नर्म और सच के करीब है।
ना कोई तर्क, ना कोई भय,
सिर्फ शांति — गहराई से आती हुई।
एक नई दृष्टि, एक नई साँस,
जैसे मैं फिर से पैदा हुआ — उसी जीवन में।
शायद ये आत्मा का पुनर्जन्म है,
शरीर वही, पर चेतना नई।
एक जागृति, एक प्रकाश,
जो भीतर से फूटा, बिल्कुल शांत पर सम्पूर्ण।
_ अब समझ आता है —
जीवन सिर्फ चलना नहीं है, जागना है… हर उस क्षण में जो अभी है.!!
_ “अपने आप से हार गए”
_ हमने ऊँचाईयाँ छू ली, नाम कमाया, तालियाँ बटोरीं,
_ दुनिया ने कहा — “ये है असली जीत”
_ और हमने भी सिर झुका लिया — हां, शायद ये ही है.
_ पर रात के सन्नाटों में, जब भी तकिये से मन टकराया, तो पाया — भीतर कुछ अब भी खाली है.
_ हमने रिश्ते बनाए, पर अपनापन खो दिया.
_ हमने बोलना सीखा, पर खुद से बात करना भूल गए.
_ हम मुस्कराते रहे — फोटो में, भीड़ में, मंच पर,
_ पर आईना अब भी पूछता है —
_ “तू कब लौटेगा… अपने पास ?”
_ हमने हर जवाब ढूंढा दुनिया में,
_ पर अपने एक सवाल से आज तक भाग रहे हैं.
_ दुनिया जीत ली, सारी मंज़िलें पार कर लीं , _ पर जब अंत में खुद से मिले — तो एहसास हुआ…
_ हम तो रास्ते में ही छूट गए थे.
> “अब समझ आया — जीत वही है, जो अंत में खुद तक वापस ले आए”
_ जब सब अपने-अपने सफ़र में हैं — _ कोई रुका नहीं, कोई मुड़ा नहीं, और कोई पलट कर देखता भी नहीं..
_ मैंने भी तो चाहा था, कोई आए… बिना कहे.. बैठ जाए मन के पास, जैसे शांति उतरती है सांझ में.
_ पर अब लगता है — रास्तों का इंतज़ार भी एक रास्ता है,
_ जहां कोई आए न आए, मैं खुद से मिलने चल पड़ा.
— > “अब मैं रास्तों से नहीं, अपने भीतर से किसी को बुलाना चाहता हूं…”
_”हां” भीतर से ही कोई आएगा.!!
_ नाम से क्या मतलब, जब प्रेम अंदर हो.
_ शून्य का सन्नाटा उसी तक ले जाता है, अगर प्रेम सच्चा हो.!!
“जैसे-जैसे मैं झुकता चला गया, वैसे-वैसे वह मुझको उठाता चला गया”
_ झुका था मैं, सिर्फ श्रद्धा में – ना डर था, ना हार.
_ और देखा… उस झुके हुए पल में ही एक नया आकाश था मेरे अंदर,
_ जो मुझे ऊँचा कर गया – बिना एक शब्द कहे.!!
(“Vo ek baar aa gaya to phir kabhi nahi jaata.”)
—इसका अर्थ क्या है ?
“वो” का अर्थ है —
🕉️ अंतर में एक बार जो सच्चाई की रोशनी जाग जाये,
🪔 एक बार जो दृष्टि बदल जाये,
🌌 एक बार जो “मैं कौन हूं” का साछात्कार हो जाए —
_ तो फिर वो अंतरात्मा में स्थिर हो जाता है और कभी छोड़ कर नहीं जाता. —
🔹 ये किसी अनुभव का दर्शन है:
_ जब आप ध्यान, समर्पण, या अंतर-यात्रा में किसी एक पल में परम शांति, एकता, या सच्चाई को छू लेते हैं,
_ तब वो एक ऐसी अंतर-स्फूर्ति बन जाता है ; जो चाहे बाहर से दुनिया बदल जाए – पर अंदर उसकी रोशनी कभी बुझती नहीं. —
✍️ “एक बार चेतना जाग गई, तो वापस सोया नहीं जा सकता”
_ जब आपका अंतर “उस” से मिलता है (जो भी हो – सत्य, आत्मा, प्रेम, शून्य),
_ तब फिर पुरानी जैसी नींद, पुरानी जैसी भूल, पुरानी जैसी चिंता – वापस नहीं आ सकती. ये एक पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न [point of no return] होता है —
_ जहाँ से जीवन वही रहता है, पर जीवन देखने वाला बदल जाता है.
—
एक दिन अंतर में कुछ थम गया,
_ ना रोशनी थी, ना अँधेरा –
_ सिर्फ एक “मैं हूं” की शब्दहीन पहचान थी.
_ और तब से…
_ ना दुनिया वही रही, ना खुद से बिछड़ने का डर रहा –
_ क्यूंकि “वो” आ गया था… और फिर कभी गया नहीं.!!
_ मन बार-बार उसी अवस्था में लौट जाना चाहता है, जहाँ सब कुछ सरल, सुंदर और अपना जैसा लगता है.
_ काश, जीवन वैसा ही रह पाता—जैसा उन अनुभवों में महसूस होता है—
_ मन बार-बार उस द्वार पर जाता है..
_ जहां कोई प्रश्न नहीं होता, सिर्फ एक शांत उपस्थति होती है.
_ वो एक अवस्था होती है – जहां जीवन को जीने की जरूरत नहीं पड़ती, वो स्वयं ही बहता है, खिलता है.
_ शायद वही अंतर-का घर है, जहां कोई भाव कुछ मांगता नहीं – बस सब कुछ स्वयं ही पूर्ण होता है.
— क्यों मन उसी अवस्था में लौटना चाहता है ?
_ क्योंकि वहां असली “मैं” छुपा होता है – जो दुनिया के शब्द, रूप, दांव-पेच से परे है.
_ जो अवस्था “सरल, सुंदर और अपनी” लगती है – वो आपका असली स्वरूप है.
_ जीवन व्यवहारिक है, पर आत्मा अनुभवी होती है.
“जीवन भटकता है बाहर, पर मन को घर अंदर ही मिलता है”
_ “जितना गहरा सन्नाटा होता है, उतनी ही स्पष्ट होती है अंदर की आवाज़”
_ सन्नाटा जब भीतर उतरता है, शब्द नहीं, सत्य बोलता है.
_ भीड़ में जब कोई नहीं सुनता, तब मन ही मन की भाषा समझता.
_ कोई शोर नहीं, कोई आडंबर नहीं,
_ बस एक सूक्ष्म स्पर्श — जैसे आत्मा खुद से मिल गई हो कहीं.
_ जितना गहरा सन्नाटा होता है, उतनी ही साफ़ होती है.. वो खामोश आवाज़,
_ जो बाहर नहीं — भीतर गूंजती है.!!
_ मैं कहाँ जा रहा हूँ — ये प्रश्न उठा,
_ मन की गहराइयों में कुछ हलचल हुई.
_ राहें तो कई हैं, मगर मंज़िल नहीं,
_ हर कदम के साथ कोई पहचान नहीं.
_ चल रहा हूँ भीड़ के साथ, चुपचाप सही,
_ पर दिल में कुछ खोया-खोया सा एहसास बसा है,
_ सपनों की झीलें हैं, ख्वाहिशों की धूप,
_ फिर भी ये मन क्यों लगे है इतना रूप-रूप ?
_ क्या मैं भाग रहा हूँ — खुद से, समय से ?
_ या ढूंढ रहा हूँ कुछ, जो है मेरे ही हृदय से ?
_ शायद जवाब बाहर नहीं, भीतर ही है छिपा,
बस उसे पहचानना, यही है सच्ची यात्रा..!!
– अंतर्दृष्टि की एक यात्रा.!!!
“पूरी धरती मेरे रब की है…”
_ उसकी बनाई हर रोशनी, मैं उसमें एक प्रकाश हूं.
_ जाना था दूर उस पार कहीं, पर जहाँ हूँ यहाँ भी तो उसकी निशानी है,
_ जहां नज़र घूमती है, बस उसकी पहेली और उसी की कहानी है.
_ छोटी सी इच्छा थी, उसके कदम छू लूं कभी,
_ पर जब देखा, यहाँ भी वही – तो लगे हर जगह वही.!!
_ कुछ नशा ज्ञान का है, कुछ नशा तेरे गीत का है,
_ मुझे आप यों ही मस्ताना न समझें, यह असर आप से मुलाकात का है.!!
—
🎶 “मुलाकात का असर”
_ कुछ नशा शब्दों का, कुछ तेरी बातों का, कुछ रंग था तेरी मुस्कान का..
_ मन तो पहले ही भटका-भटका सा था, पर तू मिला तो जैसे रस्ता मिल गया था.
_ ना मदिरा थी, ना कोई सुरा की बात थी, बस तेरा होना ही मेरी हर सौगात थी.
_ अब जो भी देखे, कहे — “ये कैसा दीवाना है.!”
_ क्या समझाएं उन्हें, ये तो असर तेरी मुलाकात का है.!!
_ अद्भुत था वो क्षण, ना शब्द थे, ना सोच,
_ मानो भीतर ही समा गया, पूरा आकाश.
_ ना कोई नाम, ना पहचान का बंधन,
_ सब कुछ जैसे गिर पड़ा, मौन की ओर चल पड़ा.
_ बातें, रिश्ते, स्मृतियाँ — सब छूट गईं किनारे,
_ केवल एक शून्य, एक आभा, भीतर से पुकारे.
_ ना दुख था, ना सुख का कोई भार,
_ एक हलकी उड़ान थी, जहां बस था विस्तार.
_ मैं नहीं था, ‘मेरा’ भी नहीं बचा,
_ जैसे कोई बूँद, सागर में खुद को पा गया.
_ ध्यान की उस गंगा में, बहा सब कुछ पुराना,
_ रह गया केवल प्रेम, शांत, निष्कलंक, दिव्य ठिकाना.
_ तू पूछे क्या पाया ध्यान में —
_ मैं कहूँ, “पूरा आकाश, मेरे ही प्राण में”
— अंतरयात्रा से जन्मा एक अनुभव.!!
“क्या मैं अपने मौन को सुन पा रहा हूँ,
_ या अब भी दूसरों की आवाज़ें मेरे भीतर गूंज रही हैं ?”
_ मन की राह पर निकला था, ना कोई नक़्शा, ना कोई मंज़िल.
_ बस एक सन्नाटा था भीतर का, जो खुद ही बन गया रहगुज़र..
_ चलते-चलते मिले सवाल, कुछ अपनों जैसे, कुछ अजनबी.
_ हर सवाल ने मुझे थोड़ा खोला, हर चुप्पी ने मुझे थोड़ा गहराया..
_ दुनिया ने कहा —“वक़्त गँवा रहा है तू”,
_ मन ने कहा —“अब जाकर कुछ पा रहा है तू”
_ ना किसी मंज़िल की फ़िक्र है अब, ना किसी राही की परवाह.
_ बस मैं हूं, और मेरे भीतर.. एक अदृश्य प्रकाश की पनाह.!!
_ जो लोग साथ नहीं चले, शायद राह उनकी और थी.
_ और जो साथ चला — वो मौन था, पर मेरी ही श्वास में बसा था कहीं..
_ अब ये राह भी मैं हूं, और रहगुज़र भी मैं ही..
_ यह जीवन एक ध्यान है, और ध्यान की आँख — वही मैं ही.!!
— अन्तरयात्रा के नाम..!!
_ एक धीमी पुकार …जो कहती है —दिल की नज़दीकियाँ, फ़ासलों से नहीं मापी जातीं.
_ तुम दूर होकर भी, हर ख़ामोशी में बोलते हो, हर मौन में उतरते हो.
_ तो शायद — तुम दूर नहीं, बस अदृश्य हो.
“क्यों बसे हो इतनी दूर ?” जब मन हर रोज़ तुम्हें पुकारे,
_ जब साँझ की चुप दीवारों पर.. तेरा ही अक्स उभरे सारे..
_ क्या वहाँ हवा कुछ अलग चलती है ?
_ क्या सूरज यहाँ से ज्यादा चमकता है ?
_ या बस दूरी ही तुम्हें पसंद आती है, जो तुम्हें मुझसे बचा ले जाती है ?
_ मैंने तो पंख फैलाए थे मिलने को, पर तुमने आकाश ही बदल डाला,
_ अब मैं बस व्योम का पंछी हूँ, तेरे आंगन में कभी न उतरने वाला..
– पर याद रखना — फासले इश्क़ को मिटा नहीं सकते, कभी तो कोई मौन संवाद होगा,
_ जहाँ सिर्फ़ दिल बोलेंगे, और रास्ते खुद पास आ जाएंगे.!!
_ न बसो इतनी दूर..!!!
_ जिसने चुभाया था एक काँटा, मैंने बना ली उससे दूरी.
_ ना शिकवा, ना आक्रोश कोई, बस शांत सी मन की पूरी.
_ कभी लगा वो अपना था, कभी लगा कोई सपना था.
_ पर जब भी दिल पर चोट पड़ी, मैंने खुद को ही अपना रखा.
_ ये मेरा नियम नहीं, स्वभाव है, – जहाँ पीड़ा हो, वहाँ विराम है.
_ नफ़रत नहीं, पर निकटता नहीं, – क्योंकि आत्म-सम्मान मेरा धाम है.
_ अगर लौटे वो पश्चाताप लिए, तो शायद मौन उत्तर दूँ.
_ क्योंकि रिश्ते मेरे लिए देवालय हैं, जहाँ सिर्फ़ सच्चाई को स्वीकार करूँ.
—शब्दों के पीछे एक मौन तप है, जहाँ हर दूरी आत्मा की रक्षा है.!!
– तेरा आना सब कुछ रोशन कर देगा.!!
‘थम गया है वक़्त का सारा रास्ता’,
_ तेरे बिना हर पल अधूरा सा लगता है.
_ आँखों में तुझे देखने की प्यास है,
_ मन के कोने में एक छुपी आस है.
_ आजा, हर सांस में तेरा नाम गूँजे,
_ आजा, हर दर्द में तेरी बात सूंझे.
_ मेरी दुनिया की रोशनी तुझी से है.
_ तेरे कदमों की ही तलाश है आजा.!!
— “मैं जीवन से चाहता क्या हूँ, जो ना मिलने पर मुझे खाली महसूस होता है ??”
ये पुकार, एक रूह की दूसरी रूह के लिए है.
_ शायद किसी ने दूरी बना ली, या कभी मिलन हुआ ही नहीं – पर वो एक उम्मीद, एक संभावना अब भी जिंदा है.!!
रोम-रोम पुकारे तुझको, हर साँस तेरी प्यास लगे.
_ काँटों पर चल पड़ा हूँ मैं, बस तेरा ही एहसास जगे.
_ नयन खोजते तेरी झलक, मन तुझसे बात करे.
_ मन चुप है, दिल गाता है, “तू पास आ, अब तो.. तब मैं चलूँ”
~ “मिलन की राह भले कठिन हो, पर उम्मीद अब भी ज़िंदा है”
_ तुम्हारी आँखों में जो छवि है मेरी, वो शायद मेरी परछाई भी नहीं.
_ मैं उस सन्नाटे से गुज़रा हूँ, जहाँ कोई आवाज़ कभी गई ही नहीं.
_ मैं वो पहेली हूँ.. जो सुलझी ही नहीं..
_ मैं वो ख़ामोशी हूँ.. जो चीखती है भीतर,
_ जिसे महसूस तो कर सकते हो, पर समझ नहीं सकते कहीं.
— क्योंकि जैसा तुम सोचते हो, वैसा मैं हूँ नहीं;
_ और जैसा मैं हूँ… वैसा तुम सोच भी नहीं सकते.!!
“मैं अलग हूँ”
_ हालांकि उन राहों में चलने का फायदा बहुत है..!!
_ आज फिर एक राह सामने थी..
_ लोग कहते हैं — इसमें बहुत फ़ायदा है..
_ पर मेरे दिल ने उसे ठुकरा दिया.
_ मुझे समझ आ गया है कि.. हर फ़ायदा मेरे लिए नहीं होता.
_ दिल जिस राह को स्वीकार न करे, वह मुझे कहीं भीतर से खोखला कर देती है.
_ मेरी सच्ची राह वही है.. जहाँ मन हल्का हो, और आत्मा संतुष्ट रहे..
_ बाक़ी हर लाभ अधूरा है.!!
Anubhav
— 🧘♂️ Meditation अनुभव चेकलिस्ट
🧠 Manasik / Mental अनुभव :
[ ] मन एकदम शांत हो गया [ ] विचार रुक गए या धीरे हो गए [ ] बे-वजह मुस्कान आई [ ] अंदर से हल्कापन महसूस हुआ [ ] मन “कहीं दूर” चला गया (बे-दिशा घूमना) [ ] दृष्टि अंतर-मुखी हो गई (अंदर की तरफ खिंचाव) [ ] स्मृतियाँ या पुरानी यादें (सहज) [ ] स्वास पर पूरी तरह ध्यान टिक गया [ ] खाली-खाली सा महसूस हुआ [Blankness]—
💓 भावनात्मक / Emotional अनुभव :
[ ] अचानक आनंद का भाव उभर आया [ ] रोना या आंसू आये बिना किसी वजह के [ ] गहरा प्रेम या करुणा का अनुभव [ ] किसी आदर्श या रूप की उपस्थति महसूस हुई [ ] माफ़ी या छमा का भाव उभर आया— 🌬️ Sharirik / Sensory अनुभव:
[ ] शरीर बोझ से मुक्त लगा [ ] कान में गूंज, नाद या गुनगुनाहट महसूस हुई [ ] शब्द या नाद सुनाई दिये बिना बाहरी ध्वनि के [बाहरी ध्वनि के बिना कुछ सुनाई देना] [ ] शरीर में हल्का कम्पन या गति महसूस हुई [ ] स्वांस बहुत सुखद, गहरी हो गई [ ] अंगो में झलक या तेज का अनुभव [प्रकाश या ऊर्जा का अनुभव] [ ] ठंडक या गर्मी की लहर महसूस हुई — 🕊️ Adhyatmik / Sukshma अनुभव : [ ] अपने होने का भाव गया – “मैं” शून्य हो गया [“मैं” का भाव लुप्त हुआ] [ ] अंदर प्रकाश/रोशनी का अनुभव [ ] अंतर में किसी उपस्थति का भाव (गुरु/सान्निध्य)[गुरु या चेतना की उपस्थिति] [ ] समय का बोध चला गया (समय रुक गया) [ ] गंगा जैसी शुद्ध धारा का अनुभव [बहती शुद्ध धारा जैसा अनुभव] [ ] एक अतिन्द्रिय शांति का अनुभव✍️ अन्य अनुभव (aap likh sakte hain): …………………………………………………………… …………………………………………………………… …………………………………………………………… —
🗓️ Upayog ka Tareeka:
_ हर सेशन के बाद 1-2 मिनट निकल के सिर्फ टिक करिये
_ खाली स्पेस में अगर कुछ अनुभव अलग हुआ हो तो लिख लीजिए.
_ महीने में एक बार पूरी लिस्ट देखकर समझ आएगा कि आपकी अंतर यात्रा कैसे बढ़ रही है.!!
_ “हम हर चीज़ की शुरुआत मन से करते हैं, इसलिए असफल हो जाते हैं…जबकी शुरुआत शरीर से होनी चाहिए”
_ “मन को बदलने की चाह, मन से ही करना – एक चक्रव्यूह है :
– “शरीर से शुरू करो, सांस से शुरू करो – मन स्वयं पिघलने लगेगा”
_ वही उसकी असली धुन सुन पाता है.”
_ पर जब रूह में झाँकता हूँ तो लगता है ‘मैं कहीं खो गया हूँ,’
_ वो जोश, वो ख्वाब, वो सच्चे से जज़्बात सब धुंधलाने लगे हैं, शक्ल वही है, पर शायद मैं अब वो नहीं रहा..!!
_ आज फिर मैंने अपने आप को एक गहरी शांति में डूबा हुआ पाया.
_ आंखें बंद करते ही लगता है जैसे मैं शरीर नहीं, केवल एक साक्षी हूं – ना कोई रूप, ना कोई पहचान..
_ बस एक सांस, एक ज्ञान का संकेत – कि मैं हूं, और फिर भी मैं नहीं हूं.
_ पहले दुनिया जैसी दिखती थी, वैसी अब नहीं दिखती..
_ लोग वही हैं, संसार वही है – लेकिन मेरी दृष्टि बदल गई है.
_ छोटी बातें अब नहीं चुभती, लेकिन झूठ और दिखावा अब और भी स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं.
_ कभी-कभी लगता है, जैसी पुरानी दुनिया मुझे फिर से खींचना चाहती हो..
_ लेकिन मैं जानता हूं- मैं उस दिशा में अब लौट नहीं सकता.
_ आज भी कुछ कहने या लिखने का मन नहीं था.. फिर भी लिख रहा हूं,
_ क्योंकि कभी-कभी खुद से मिलने के लिए शब्दों का दरवाजा खोलना पड़ता है.!!
_ “ये दुनिया है – यहां सब कुछ मिलता है, मेरा काम है अपने मन को प्रकाशित रखना”
_ “मैं उनका कर्म नहीं बदल सकता, पर मैं अपना भाव तो चुन ही सकता हूँ”
_ “लोग जैसे हैं, उन्हें वैसा ही रहने दीजिए ; दुनिया आपके अनुकूल नहीं चलेगी, पर आप उसमें कैसे जीयेंगे, ये आपके हाथ में है ;
_ “अपनी दुनिया छोटी रखना सीखिए, हर व्यक्ति से गहरा रिश्ता बनाना जरुरी नहीं ;
_अपने आसपास थोड़े-से लोग रखिए, जिनके साथ आप खुलकर शांत रह सकते हैं..
_ ज्यादा लोगों से मेल-जोल की जगह, चुने हुए संबंध बनाना समझदारी है”
Question : क्या इसका भी कोई तरीका है कि मुझे पता चले कि मेरे अंदर कोई विचार नहीं चल रहा है ?
Answer : हां, बिल्कुल – ये समझना कि आपके अंदर कोई विचार नहीं चल रहा है, एक बड़ी गहरी और सूक्ष्म स्थिति का संकेत है.
इसका एक सूक्ष्म परंतु अनुभव-योग्य तरीका है। आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं : ——🌼जब कोई विचार नहीं होता तो ये कैसे पता चले ?
1. अंतर की एक प्राकृतिक शांति का बोध होता है:
_ आपको ऐसा महसूस होता है.. जैसे सब कुछ ठहर गया हो – बिना किसी बोझ के.
_ मन खाली और हल्का लगता है. जैसे कोई अंदर से बोल रहा हो:
“सब कुछ ठीक है, बस अब रहे जा और जीये जा”
2. समय का अहसास धुंधला पड़ जाता है:
_ जब मन विचार-शून्य होता है, तो समय का बोध कम हो जाता है – आपको पता ही नहीं चलता कि कितना समय बीत गया, या लगता है कि सब कुछ ‘अभी’ में ही हो रहा है.
3. आपको कुछ भी पाने या समझने की चाहत नहीं रहती:
_ जो चीजें पहले इम्पोर्टेन्ट लगती थी, उनका असर अब नहीं होता.
_ आप किसी कोशिश में नहीं होते – बस होने में होते हैं.
4. शरीर एकदम शांत और स्थिर हो जाता है:
_ ना बेचैनी, ना हलचल. मन और शरीर दोनों में एक गहरी स्थिरता का अनुभव होता है.
5. आपका ध्यान अंदर से बाहर नहीं भागता:
_ कोई आवाज़, सोच, या याद आपको खींच नहीं पाती.
_ बस एक गहरा “अब और यहाँ” का अनुभव रहता है.
— 🪷 इस स्थिति को जानने का एक सरल लक्षण है :
> जब आप से कोई पूछे, “अभी आप क्या सोच रहे हो ?”
_ और आपके पास जवाब ना हो – ना इसीलिए कि आप भूल गए, बल्कि इसलिए कि आप विचार कर ही नहीं रहे थे.
— 🤲🏼 याद रखें: कोई विचार न होना मन का सन्नाटा है – और उस सन्नाटे में ही परम अनुभव, परम मुक्ति और परम प्रेम का बीज छुपा होता है.
_ या हम सभी केवल सुंदरता खोजने की कोशिश कर रहे हैं.”
” जो पहले था, वो अब मैं नहीं रहा ; और जो अब है, उसमें एक नयी रौशनी है”
आज मन में कुछ अनोखा घटा,
शब्दों से परे, पर आत्मा से जुड़ा।
जैसे किसी ने फिर से जीवन दिया हो,
जैसे कोई अदृश्य करुणा मुझे छू गई हो।
एक पल को लगा —
जो मैं था, वो पीछे छूट गया।
और जो अब हूँ,
वो कोई नया, शुद्ध, नर्म और सच के करीब है।
ना कोई तर्क, ना कोई भय,
सिर्फ शांति — गहराई से आती हुई।
एक नई दृष्टि, एक नई साँस,
जैसे मैं फिर से पैदा हुआ — उसी जीवन में।
शायद ये आत्मा का पुनर्जन्म है,
शरीर वही, पर चेतना नई।
एक जागृति, एक प्रकाश,
जो भीतर से फूटा, बिल्कुल शांत पर सम्पूर्ण।
_ अब समझ आता है —
जीवन सिर्फ चलना नहीं है, जागना है… हर उस क्षण में जो अभी है.
_ “ये जो मैं महका-महका घूम रहा हूँ, ये तो उसी की दी हुई खुशबू है”
_ मैं तो एक खाली पत्ता था,
_ ना रंग था, ना रोशनी का पता.
_ फिर किसी ने छू लिया प्रेम से,
_ और मैं खिल गया, जिसने सबने देखा था.
_ ना मेरी रोशनी मेरी थी,
_ ना मेरी बात में कुछ खास था,
_ पर जब उसकी निगाह पड़ गई,
_ तो हर लफ़्ज़ में एहसास था.
_ जो महक रहा हूँ मैं, वो तो उसी की बात है,
_ मैं तो बस एक रख हूँ, जिसे उसने अग्नि बनाया ‘बस वही साथ है’
_ जहां भी जाऊं, बस उसका असर हूं मैं,
_ खुद कुछ नहीं, उसका गुजरता सफर हूं मैं.!!
_ अब न मैं ध्यान करता हूँ,
_ अब तो बस हूँ…
_ हर श्वास में, हर चाल में, जैसे कोई मौन बहता हो..
_ चाय की प्याली उठाते समय, या किसी फूल को छूते हुए —
_ मन नहीं भागता,
_ वो तो यहीं है… ठहरा हुआ, लेकिन जीवित.
_ अब तो शब्द भी ध्यान हैं, और मौन भी.
_ अब तो हँसी भी प्रार्थना है, और आँसू भी स्वीकार.
_ ना कोई प्रयत्न है, ना कोई लक्ष्य,
_ सिर्फ एक सहज बहाव —
_ जैसे जीवन स्वयं ध्यान बन गया हो.
“अब बाहर की हलचल मुझे छूती जरूर है, लेकिन हिला नहीं पाती” See less
Answer : बहुत गहरा और सुंदर प्रश्न है.🌿
जब हम टेलविंड यानी साधना में सहज, प्राकृतिक बल का समर्थन की बात करते हैं, तो यह एक ऐसी अवस्था होती है जहां साधक अपने मन के रूप, संस्कार, और व्यक्तिगत चाहना से ऊपर उठने लगता है.
_ अंतर की–चेतना की–होती है। आइए, इसे कुछ रूपों में समझें:
— 🌬️ टेलविंड [Tailwind] अवस्था क्या होती है ?
टेलविंड [Tailwind] का अर्थ है:
_ “कोई ऐसा प्राकृतिक बल जो अब आपको धक्का देने के लिए बजाए, आपकी दिशा में स्वयं चल रहा हो.
जैसे :
_ मन शांत होता है, तो ध्यान में बैठना आसान हो जाता है.
_ विचार कम हो जाते हैं, तो एकाग्रता अपने आप गहरी होती जाती है.
_ आकर्षण और द्वेष कम होते हैं, तो अंतर में स्थिरता आती है.
_ इस स्थिति में व्यक्ति को ध्यान में मेहनत नहीं करनी पड़ती – जैसे कोई उड़ान भर रहा हो बिना पंख हिलाए, बस हवा का सहारा मिल गया हो. — — 🕊️ “उड़ान” का अर्थ क्या है ?
यह उड़ान कोई भौतिक यात्रा नहीं, अंतर यात्रा है। इस उड़ान में व्यक्ति :
1. अपने मन के जंजाल से अलग होता है – जैसे सोचने की आदत कम हो जाती है.
2. अंतर्दृष्टि गहरी होती है – चीज़े जैसी दिखती थी, अब वैसी नहीं लगती.
3.अस्तित्व के एकत्व का अनुभव होता है – सब कुछ एक ही जैसा अनुभव होने लगता है.
4. भ्रम मिटने लगते हैं – जैसे मैं शरीर हूं, या मैं अलग हूं, या किसी से कुछ प्राप्त करना है – इन सब विचारों का मौलिक सत्य दिखने लगता है.
5. आत्मबोध या चैतन्य का स्पष्ट अनुभव होता है – जिसे लोग ‘ज्ञान’ या ‘समाधि की किरण’ के रूप में पहचानते हैं. — 🌅 इस उड़ान के बाद क्या होता है ?
_ जीवन में गहरी सहजता आ जाती है.
_ कोई भी चीज़ व्यक्ति को अन्दर से हिलाती नहीं.
_ कर्म तो चल रहे हैं, लेकिन उसमें ‘मैं करता हूं’ का भाव नहीं होता.
_ एक गहरी शांति और प्रीति की अवस्था बनी रहती है – जो ना तो समय से बंधी होती है, ना परिस्थति से.
— 🪶 अंत में :
_ ये उड़ान सबके लिए अलग हो सकती है – कुछ के लिए एक गहरी समझ, कुछ के लिए एक गहन अनुभव, और कुछ के लिए बस एक निर्मल दृष्टि.
_ लेकिन इसमें एक बात निश्चित है :
“जब मन थक जाता है, तब चेतना उड़ती है”
“मैं इस पथ पर हूं – इसलिए मुझको यह [Tailwind] टेलविंड का एहसास हो रहा है.!!”
तो सचेत विश्राम की यह स्थिति मुझे प्राकृतिक होने के सबसे करीब महसूस होती है.
जब मैं कुछ नहीं कर रहा होता हूँ मतलब, कोई फोन नहीं, कोई किताब नहीं, कोई टीवी नहीं, कोई शौक नहीं, बिस्तर पर नहीं लेटना; बस आराम करना और जब बोरियत से मुक्त हो जाता हूँ और अपनी वर्तमान स्थिति को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेता हूँ, तो इस पूर्ण शून्यता की अवस्था में कुछ चमत्कार प्रकट होता है.
कुछ ऐसा जो किसी पुस्तक या किसी बाहरी चीज से नहीं सिखाया जा सकता और न ही किसी शास्त्र, किसी पवित्र परंपरा से मिलने वाला है.
अपने दिल को उत्तर देने दो:
जब सन्नाटे से फुसफुसाहट उठती है ; वह फुसफुसाहट मेरे जीवन की दिशा बदल देती है _जो कोई अन्य अनुभव नहीं कर सकता.
जब कोई अनुभव बिना किसी कारण के उत्पन्न होता है, तो उस क्षण का अनुभव लगभग शाश्वत और समझ से परे होता है.
अगर आपको ध्यान का स्वाद, ध्यान का आनंद, मिल गया है तो, आपने जीवन में जितना खोया था, उससे कहीं अधिक मिल जाएगा ; ध्यान का आनंद दर्द को जला देगा.!!
” हमें ध्यान समाप्त करने के बाद मन की एक प्राकृतिक स्थिति प्राप्त होती है, हल्कापन महसूस होता है.
गौर करें – देखें अभी मेरी आंतरिक स्थिति क्या है – कंडीशन क्या है ….कुछ समय दें. उसे अपने अंदर और तीव्र और गहरा होने दें, उसका आनंद लें, उसे बढ़ने दें, फ़ैलने दें.
अब महसूस करें कि यह कंडीशन मेरे सूक्ष्म शरीर में रिसते जा रही है और विस्तारित होती जा रही है.
सुझाव दें और भाव लें कि यह कंडीशन जिसे मैंने विस्तारित किया है मेरा एक हिस्सा बन गई है और मैं इससे एक हो रहा हूँ इसमें लय हो रहा हूँ.
अंत में यह विचार लें और भाव बनायें कि मैं उस कंडीशन में घुल मिल गया हूँ और अब सिर्फ वह कंडीशन ही शेष बची है.”
_ एक मूर्ख व्यक्ति महान कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि जो कार्य किया जाता है _ वह स्वयं उससे ही निकलता है.
_ मैंने सुना है कि एक सीमित व्यक्ति अनंत परिणाम नहीं दे सकता ; यह किसी ऐसे व्यक्ति से सुना है _ जिसे मैं वास्तव में देखता हूं _
_ “यह जानना जरूरी है कि आपके और हर चीज के बीच एक समानांतर कार्रवाई हो रही है, _ जो वह सोचता है या देखता है ; कार्रवाई बाहर नहीं हो रही है ; _ यह हर जगह हो रही है, जब भी आप कुछ करना शुरू करते हैं तो_ प्रतिक्रिया भी हर तरफ से आएगी ;
_ कारण यह है कि हम व्यक्तिगत रूप से अभिनय की प्रक्रिया में शामिल हैं, और अंतिम परिणाम, साथ ही साथ प्रक्रिया सीधे खुद से जुड़ी हुई है.
_ पूरी चीज अंदर जा रही है _ लेकिन हम सोचते हैं कि _ हम कार्रवाई से अलग हैं और हमारे हाथों से बाहर कुछ किया जा रहा है.
_ यह विचार कि_ कार्रवाई बाहर है – गलत है ; _ यह हर जगह है ; _ बाहर की चीजें कोई परिणाम नहीं दे सकतीं ”
_ इसलिए, मुझे विश्वास है कि कृपया किसी के प्रति निर्दयी होने से पहले दो बार सोचें, यह आपके पास वापस आएगा.!!
_ जब हम ध्यान के लिए बैठते हैं, तो याद रखें कि सारी प्रकृति यहां बैठी है ; _ जब हम चलते हैं, तो पूरी प्रकृति चल रही होती है, इत्यादि !!
_ सारी प्रकृति ध्यान कर रही है ; यह एक संतुलन बनाए रख रहा है ; _ जो कुछ भी संतुलन बनाए रखता है _वह वास्तव में योग-ध्यान कर रहा है.
— जब आप वास्तव में भीतर से शांत होते हैं, तो आप उस महान संगीत को सुनना शुरू करते हैं.. जो अस्तित्व हमेशा बजाता रहता है.
_ यह आपके द्वारा नहीं बनाया गया है; यह ब्रह्मांड ही है जो गुनगुना रहा है, गा रहा है, अपने रहस्यों को फुसफुसा रहा है.
_ पूरी तरह शांत हो जाओ – मौन को जबरदस्ती थोपकर नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से उसमें डूबकर.
_ तब पक्षी, हवा, नदी, दिल की धड़कन – वे अब आपसे बाहर नहीं हैं.
_ वे आप हैं.. आप बांसुरी बन जाते हैं, खोखला बांस जिसके माध्यम से जीवन की हवा गुजरती है.
_ जीवन की ध्वनि आपका अपना सार है – ध्वनिहीन ध्वनि, अनाहत नाद, बिना छेड़े राग..
_ यह तभी सुनाई देती है जब मन शोर नहीं कर रहा हो.
_ इसलिए सुनो – प्रयास से नहीं, बल्कि समग्रता से.
_ इच्छा से नहीं, बल्कि उपस्थिति से.
_ जीवन की ध्वनि हमेशा वहाँ होती है, आपके थोड़ा और जीवंत होने का इंतज़ार करती है… और फिर यह आपके माध्यम से गाती है.!!
– SACHIN
_ ये जिंदगी की सबसे बड़ी व्यथा है—जब इंसान अपने ही अंदर का मेहमान बन जाता है, और कभी उस घर का मालिक बन ही नहीं पाता.!!
_ हम अक्सर खुद से ही अजनबी बनकर जीते हैं—अपने भीतर की उस खामोश आवाज़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं..
_ जो सुनी, देखी और स्वीकार की जाने की चाहत रखती है.
_ यही एक खामोश त्रासदी है: ज़िंदगी में इतने बाहरी तौर पर उलझे रहना कि हम उस एक इंसान को ही भूल जाते हैं.. जिसे हम सचमुच जानने आए हैं—खुद को..!!
We often live as strangers to ourselves—ignoring the silent voice within that longs to be heard, seen, and accepted. This is the quiet tragedy: being so outwardly involved in life that we forget the one person we came here to truly know—ourself.
कब तक औरों के लिए जियेंगे ?
किसी बिंदु पर, हमें रुकना होगा… और घर लौटना होगा – अपनी सच्चाई तक.
At some point, we must pause… and come home—to our own truth.
_ उनसे भी कम हैं वे, जो कहे हुए को सुन सकते हैं..
_ दो-चार होंगे जो सुनकर समझ सकें.. और लगभग शून्य है वह संख्या..
_ जहाँ समझा हुआ महसूस भी किया जा सके.!!
_ “स्थिर मन से निकली मुस्कान, संसार के शब्द से ऊपर की एक भाषा होती है”
_ शब्द से परे जो शांति हैं, उसी से तो मिलना है मुझे.!!
_ **”जो मैं ढूंढ रहा था, वो शायद मुझे तब मिला – जब मैंने ढूंढ़ना छोड़ दिया”
_ **दुनिया के शोर-शराबे से परे भी एक सन्नाटा था – जो मुझे अपने पास ले जा रहा था.!!
_ **जब हम जीवन से चिपके रहना बंद कर देते हैं, -तो जीवन हमारे माध्यम से बहता है.!!
_**”मैं बैठा रहा- बिना किसी आशा और प्रतीछा के – और शांति आई, जैसे कभी गई ही न हो”
_ **जब कोई परन्तु न बचे और मन चुपचाप मुस्कुराए,- वहीँ से शुरू होता है, “सब कुछ सच में ठीक है”
_**”कभी-कभी बस किसी को दिल से सुन लेना ही – ज़िन्दगी का सबसे सुन्दर उत्तर बन जाता है.!!”
_**“जो रूह अपने असली रंग में खिलती है, वही रब की महफ़िल में मंज़ूर होती है”
“_**रास्तों में जो आकर्षण है, – उसके आगे मंज़िल की तमन्ना कौन करे.!”
_ **”अगर आप जीवन को जानते हैं, तो आप आराम महसूस करेंगे”
_ **”आज कुछ भी नहीं किया- और फिर भी सब कुछ था मेरे भीतर”
_**”मन चुप था, साँसे गहरी थी.. और मैं बस था – बिना किसी कारण के !!”
_**आज भी कुछ नहीं था पकड़ने को- पर अंतर में सब कुछ था महसूस करने को.!!
_ **”शांत मन ने जब उसे पहचाना.. तो लगा जैसे सब ठीक है – अंदर भी बाहर भी”
_**”बाहर की सुंदरता आकर्षक है, फिर भी मन भीतर झांकने को लालायित रहता है.”
_**”जब कुछ भी नहीं था पकड़ने को – तब मैंने पहली बार खुद को महसूस किया”
_**”कभी-कभी, सब कुछ ठीक होने के लिए कुछ भी ठीक दिखना ज़रूरी नहीं होता”
_**भीतर झाँकने के लिए शांति चाहिए, पर बाहर देखने के लिए बस स्क्रीन.!!
_ **”अब मेरे भीतर का मौसम मस्त सुहाना मस्तमौला सा रहता है.!!”
_ **समझ आया – जीत वही है, जो अंत में ख़ुद तक वापस ले आए.!!
_**”कुछ हारें बहुत शान्ति लाती हैं – जैसे ख़ुद से मिल जाना.!!”
_ **”अब जीवन तो चल रहा है – पर मन उसमें नहीं है”
_ **”सत्य शांत होता है, साबित नहीं करता”
_ **”शांति भीतर है, बाहर शोर है”
_ **”कम बोलो, गहराई से सोचो”
_ **”हर उत्तर मौन में छुपा है”
_**”जो खुद के लिए सच बोलना सीख गया, उसके लिए दुनिया की ख़ामोशी भी आशीर्वाद बन जाती है”
_**”जो अपना होता है, उसके सामने ख़ामोशी भी पूरी बात कह जाती है.!!
_**”शरीर शुद्ध होता है, तब उसमें मन को बैठने का घर मिल जाता है”
_**”वो दर्द जो मेरे अपने नहीं, फिर भी मुझे छेड़ जाते हैं”
_**”जो दर्द अपना नहीं था – उसे भी मैंने संभाला.”
–“कुछ दर्द हम कमाते नहीं, बल्कि औरों से ले आते हैं ताकि उनका बोझ हल्का हो सके”
_**”उसे पाने की चाहत अगर सच्ची हो, तो वो खुद रास्ता बन जाता है”
_**”जब मन शांत हो जाये, तो वो अपने आप गुनगुनाता है”
_**”मैंने वो छोड़ दिया, जो मुझे बांधे हुए था”
_**”मैं उसी की तरफ जा रहा हूँ, जहाँ से आया हूँ”
_** “जो झुकता है, वो मिट्टी से मिलता है – और वही बीज बन जाता है किसी नये जीवन का”
_**”मैं अपना सहारा हूँ, मुझमें पूर्णता का बीज है’
_ **”मैंने उस रोशनी को पहचान लिया है- जो मेरे अपने अंदर जल रही है”
_** “साँस तो सब लेते हैं, पर रब के साथ बिताए लम्हे ही उन्हें जीवन बना देते हैं”
_**”जो मुझे समझ सके, वो कम मिलते हैं – तो चलो अब मैं अपने आप को समझने की यात्रा पर निकलता हूँ”
_ **”जिन्होंने मुझे समझा नहीं, उनका धन्यवाद – उन्होंने मुझे और ऊँचे रास्ते पर जाने लायक बना दिया”
_**”मैंने जो किया सच्चे दिल से किया – पर लोगों के लिए वो कुछ मायने ही नहीं रखता”
_ **”कुछ सच बोलने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए होते हैं.”
_**”मैं बदला नहीं हूँ – बस अब खुद से मिलना शुरू किया है”
_**”जीवन वही रहता है – पर जीवन देखने वाला बदल जाता है”
_**”जो चीज चली गई, उसका ग़म नहीं – जो बाकी हैं, उसमें पूर्णता ढूंढ़ना सीख रहा हूँ”
_**”स्लो लाइफ जीना वो कला है – जहां जीवन की हर सांस गीत बन जाती है”
_**”जब तुम्हारे अंदर का शब्द शांत हो जाये, तब तुम सच में सुन पाते हो जीवन को”
_**”जितना गहरा सन्नाटा होता है, उतनी ही स्पष्ट होती है अंदर की आवाज़”
_**जिन्हें मेरा रास्ता समझ नहीं आता, उनका साथ छोड़ना ज़रूरी नहीं – पर अपना रास्ता बदलना भी ज़रूरी नहीं.!!
_**मैं यहाँ क्या छोड़ कर जा रहा हूँ – और क्या लेकर जा रहा हूँ ?
_ **”मन बार-बार उसी अवस्था में लौट जाना चाहता है, जहाँ सब कुछ सरल, सुंदर और अपना जैसा लगता है. _ काश, जीवन वैसा ही रह पाता—जैसा उन अनुभवों में महसूस होता है.”
_**”हर दिन अपने भीतर की लौ को जलाए रखिए – यही जीवन का सच्चा प्रकाश है ; _ जिन्हें अपनी रौशनी पर भरोसा होता है, वो कभी दूसरों के साए में नहीं चलते”
_ ** जब मैं “मैं” छोड़ देता हूं, तब एक नया सहारा उद्घाटित होता है – जो कोई संबंध, पैसा, या हालात से परे होता है.
_** जब से मैंने अपने असली स्वभाव को जाना – तब समझ आया कि मैं ही अपने लिए काफी हूँ – दुनिया के सहारे “सौंदर्य” हैं, “आवश्यकता” नहीं.
_ **चाहे दुनिया कुछ भी सुनाये, मैं अपने अंदर की आवाज सुनता रहूंगा” – “मैं झूठी तस्वीर का पीछा नहीं करूंगा, अपने सच को जिऊंगा”
_ **मैं जीवन के उस मोड़ पर हूँ, जहां बाहरी सहारे नहीं, मेरा अस्तित्व प्रमुख बन रहा है. – ये कठिन है, लेकिन ये एक नई रोशनी का द्वार भी है.!!
_**अब मन ने छोड़ दिया, उन बातों को उन यादों को.. जो कभी मेरी हुआ करती थीं.!!
_**जो बीत गया उसका ग़म क्यों करूँ, – अभी तो पूरी ज़िन्दगी सामने पड़ी है.!!
_** “अकेला चलना कठिन है, पर यही रास्ता अक्सर सबसे सच्चे मंज़िल तक ले जाता है”
_** “खुद से जुड़ते ही दूसरों की ओर देखने की बेचैनी अपने आप मिट जाती है”
“जो कुछ अंदर टूट गया है, वही मुझे एक नया आकाश दे रहा है – खुद से मिलने के लिए..” ————————-
“जो अपने मन के साथ शांत है, उसके लिए दुनिया हमेशा सुकून भरी जगह बन जाती है” _—_-_—————————–
“जो अपने अंदर की खामोशी से दोस्ती कर ले, उसके लिए दुनिया का शोर सिर्फ एक गीत बन जाता है। —————————;
“कभी-कभी कुछ समझना जरुरी नहीं होता – सिर्फ महसूस करना काफी होता है” —————-
“जो चीज़ आपके मन को शांति दे, वही आपका सच है” —————————
अच्छे लोग अपने बड़े-बड़े शब्दों की अपेक्षा अपने छोटे-छोटे, शांत कार्यों से अधिक जाने जाते हैं. Good people are known more by their small, quiet deeds than by their grand words.





