सुविचार 2948
नहीं खायीं ठोकरें सफर में तो मंजिल की अहमियत कैसे जानोगे,
अगर नहीं टकराये गलत से तो सही को कैसे पहचानोगे.
अगर नहीं टकराये गलत से तो सही को कैसे पहचानोगे.
_ और अनुशासनहीन मन दुख की ओर ले जाता है.
मेरे अंदरूनी मन की खबर रखता है,
शायद की मैं उसे भुला देता मगर,
याद आने के वो सारे हुनर रखता है।।।।।।
जैसे ही दीपक जलाया मैंने…अंधेरा नाराज होकर चला गया..!
बस एक व्यवहार और लगाव ही है, जो कभी बूढ़ा नहीं होता…..!!
चिन्ता ख़त्म होती है जब विश्वास आरंभ होता है.
अजनबी हाल पूछ रहे हैं और अपनों को खबर तक नहीं.
पर अनचाही बात को, दिल से देवो निकाल.
तब सब लोग आपका सम्मान करते हैं.
हमें जो चाहिए वही होगा.