_ मस्त आदमी का अर्थ होता है : अब चलाने वाला नियंत्रण भीतर न रहा, अब तो छोड़ दिया सा रब पर, जहाँ उसकी मरजी हो ले जाए, डुबाना हो-डूबा दे ;
_ हम गीत गुनगुनाते डूब जायेंगे, मिटना हो-मिटा दे, हम मुस्कुराते मिट जायेंगे, जो उसकी मरजी- जैसी उसकी मरजी..!!
_ अस्तित्व अकेला है. इस अस्तित्व के बाहर कोई लक्ष्य नहीं है..- इसलिए जो आदमी अपने जीवन में लक्ष्य छोड़ दे और वर्तमान के क्षण में ऐसा जीने लगे, जैसे खेल रहा है, वह आदमी यहीं और अभी परमात्मा का अनुभव करने में सफल हो जाता है.!!
कोई अच्छे और बुरे की बात प्रकृति में नहीं है, क्योंकि वहां विकल्प नहीं है, वहां चुनाव ही नहीं है.
_ और उतनी शक्ति ध्यान में लगाई जा सकेगी, अन्यथा हम एग्झास्ट हो जाते हैं !!
गीत गाता और नाचता दिखाई देगा !
जब दूसरे हमें खुश दिखाई पड़ते हैं तो हम और दुःखी होते चले जाते हैं.
सिर्फ यह देखो कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है.
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जो तुम्हारे सुख में सुखी नहीं हुआ, वह तुम्हारे दुख में दुखी कैसे हो सकता है ?





