सुविचार – भाषा – 072

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शरीर की भाषा सबसे ज्यादा बोलती है.
कोई भी भाषा को भाषा के ही रूप में प्रयोग करना चाहिए — मतलब, भाषा विचारों के आदान-प्रदान का साधन है. _बस !!

_सांकेतिक भाषा से भी विचारों का आदान प्रदान होता है. _ इसको निज-गौरव इत्यादि जैसी बातों से जोड़ना सही नहीं है.

मनोवैज्ञानिक बेंजामिन होर्फ के मुताबिक ” भाषा हमारे सोचने के तरीके को स्वरुप प्रदान करती है और निर्धारित करती है कि हम क्या- क्या सोच सकते हैं ?”

कहने का अर्थ यह है कि हमारे शब्द खुद ही भीतर और बाहर के एक परिवेश का जाल रचते हैं, इसलिए ख्याल रहे कि अपमानजनक लहजे और अश्लील शब्दों के साथ किया गया संचार एक चक्रव्यूह की तरह होता है. यह आपके आसपास नकारात्मकता का एक ऐसा जाल निर्मित कर देता है, जिसमें एक बार फंस जाने के बाद यह व्यवहार आपकी बोली और भाषा का हिस्सा बन जाता है. इससे लोगों की नजर में आपकी वैल्यू गिरती जाती है. अतः कोशिश यही होनी चाहिए कि आप इस दिखावटी आत्मविश्वास और कूल दिखनेवाली भाषाई बेहूदगी से बच कर रहें.

शब्दों को तहजीब का साथ न मिले तो अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती. इतना ही नहीं, भाषा की अभद्रता रिश्तों से लेकर माहौल तक, हर चीज में नेगेटिविटी भर देती है. गलत ढंग और गलत मंशा से कहे गये शब्द कुछ भी सही नहीं होने देते. अगर संवाद का तरीका गलत हो, तो कुछ सकारात्मक होने की उम्मीद ही कहां बचती है ? अतः यह समझना जरुरी है कि हमें केवल अपनी बात को कहना ही नहीं, बल्कि उसे सही ढंग से कहने की भी कला भी आनी चाहिए. इसकी बुनियाद है शब्दों की शालीनता.
अभद्र भाषा कहीं से भी प्रोग्रेसिव होने की निशानी नहीं है. सच तो यह है कि प्रोग्रेसिव विचारों का अश्लील और अभद्र भाषा से कोई लेना- देना नहीं. प्रोग्रेसिव या प्रगतिशील होने का अर्थ है – सही गलत का विवेक रखते हुए अपनी बात को दृढ़ता के साथ साझा करना और किसी का अपमान न करते हुए आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कहना तथा अन्य लोगों के दृष्टिकोण का सम्मान करना. अतः अगर प्रोग्रेसिव होने के नाम पर आप अपनी जुबान बिगाड़ रहे हैं, तो संभल जाइए.
किसी को अभद्र भाषा से ठेस पहुंचा कर आप भी सिर्फ ईर्ष्या, द्वेष, असहजता, अपमान और रिश्तों में दूरियां ही पा सकते हैं. इससे सामनेवाले की नजरों में आपकी नकारात्मक छवि बनती है. बोलने का सही ढंग और मर्यादित शब्द आपके व्यक्तित्व की प्रभावी और पॉजिटिव इमेज की सौगात देते हैं. याद रखें, जो लोग मानसिक रूप से मजबूत होते हैं, वे लोग हमेशा सधे, संतुलित और संयमित शब्दों में ही अपनी बात कहते हैं.
अक्सर लोग तनाव हो या गुस्सा आने पर अमर्यादित शब्दों का उपयोग करते हैं. पर यह जरुरी तो नहीं कि तनाव या गुस्सा जाहिर करने का तरीका बिगड़े बोल ही हों. आप लिख कर, मौन रह कर, कहीं घूम कर आदि के जरिये भी अपने तनाव को कम कर सकते हैं. इसके लिए असभ्य शब्दों को संवाद में शामिल करना आपकी कमजोरी दर्शाता है. घर हो या दफ्तर, गालियां देकर या किसी का मजाक बना कर आप किसी भी तरह औरों से बेहतर साबित नहीं हो सकते. इस ख्याल को अपने मन से निकाल दें कि अभद्र शब्दों के उपयोग से आपकी छवि एक बेबाक, बिंदास और आधुनिक वक्ता की बनेगी. आपकी बात पर लोग गौर करेंगे या आप अपनी बात मनवाने में सफल होंगे. सच तो यह है कि होता इससे बिलकुल उल्टा है.
कुछ लोग शौकिया या फैशन के तौर पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं, जो कि आगे चलकर उनके धैर्य और समझ पर हावी होती है. अभद्र शब्द आपकी बातचीत में इतनी गहराई से जड़ें जमा लेते हैं कि फिर आपके सामने बच्चे हों या बड़े, घर हो या बाहर आप बिना सोचे- समझे इन शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं. छोटी- छोटी बातों में धैर्य खोने लगते हैं. जिस तेजी से धैर्य और समझ खोती जाती है उसी तेजी से आक्रोश जताने के लिए ऐसे शब्द आपकी लाइफ स्टाइल का हिस्सा बन जाते हैं. इस कारण यह अभद्र भाषा आपसे जुड़े लोगों के मन को चोट पहुंचाने लगती है. लोग आपके साथ बातचीत ना करने की राह तलाशने लगते हैं. आपसे अपनी व्यक्तिगत बातें शेयर करना छोड़ देते हैं, कारण असभ्य या अश्लील व्यवहार किसी समस्या का हल नहीं होते. हाँ, नासमझी और नकारात्मकता से पूर्ण संवाद का यह तरीका आपके लिए नयी परेशानियां जरूर खड़ी कर देता है.

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