सुविचार – “मैं अपने लिए हूँ.” – 309

“मैं अपने लिए हूँ”

_ कहते हैं, मेरी ज़रूरत किसी को नहीं, तो क्या मैं खुद भी अपनी सज़ा बन जाऊँ ?
_ जो दूर गए, उन्हें लौटना था शायद, पर मैं खुद से क्यों बेवफ़ा बन जाऊँ?
_ काँधे ढूँढे मैंने सहारे के लिए, पर आज जाना – मेरे कंधे भी काफी हैं.
_ दर्द जब बोल उठे ख़ामोशी बनकर, तो खुद से की गई बातें भी शफ़ा सी हैं.
_ ज़रूरी नहीं कि हर दिल समझे मेरा होना, बस इतना काफी है – मैं आज भी हूँ,
और ये होना ही मेरा उपहार है – “मैं अपने लिए ज़रूरी हूँ”
– जब दुनिया अनसुनी कर दे, तब अपनी ही आवाज़ सबसे सच्चा साथ बनती है.!!

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