ईमानदार आदमी कभी खुदगर्ज नहीं होता, और बेईमान किसीका सगा नहीं होता ; स्वयं का भी नहीं.
जितना हम पढ़े लिखे हुए हैं, दरअसल हम उतने ही बेईमान बने हैं, _
_ गहराई से सोचें तो ये बात सही लगती है कि पढ़े लिखे लोग हर चीज को मुनाफे से तौलते हैं, _
_ ये बात समाज को तोड़ रही है, शिछा मतलब ये नहीं कि इंसानियत को ही भूल जायें !!
दूसरे की तकलीफ़ समझना ताक़त की नहीं, इंसानियत की निशानी है.. और यह गुण हर किसी में नहीं होता.!!
होते हैं कुछ लोग, जो स्वयं की परवाह न करके उन लोगों के बारे में कुछ करने का सोचते हैं, जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं होता.
_ ऐसे ही लोगों के बल पर इंसानियत टिकी हुई है.!!
जब कोई तकलीफ़ में हो, उनकी आँखों से आँसू निकलते हैं और मैं चाहकर भी उस तकलीफ़ को कम नहीं कर पाता, सिर्फ़ दिलासा देने के अलावा मेरे पास कुछ नहीं होता.
_ तब शायद उनकी तकलीफ़ से कहीं ज़्यादा दर्द मुझे होता है,
_ क्योंकि उन्हें रोते हुए देखना मेरे लिए सबसे मुश्किल है, और उनके दर्द के सामने अपनी बेबसी से ज़्यादा तकलीफ़ किसी चीज़ में नहीं होती.!!
– Nirarthak Nirarthak





